Sanjaya Kumar Singh
सुप्रीम कोर्ट में एक अधिवक्ता ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को गाली दी, कोर्ट में अभद्रता की और जिस मामले के लिए पेश हुआ था उसके दस्तावेज उछाल दिए. अदालत ने इसके लिए संबंधित वकील के खिलाफ किसी कार्रवाई की जरूरत नहीं समझी और उसे हताश कहा.
जो भी हो, विरोध का यह तरीका अपनी तरह का पहला है और खबर तो है ही. लेकिन अखबारों में इसे महत्व नहीं मिला. अदालत ने कार्रवाई नहीं की यह उसका बड़प्पन हो सकता है लेकिन गाली देने वाले ने तो जोखिम लिया ही था. उसके पास इसका कारण भी होगा और मीडिया का काम है कि उसे मंच और आवाज दे.
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ठीक है कि उसे गाली देने के लिए मंच नहीं दिया जा सकता है लेकिन उसकी बात सुनी जानी चाहिए और संपादक को तय करना होगा कि वह सार्वजनिक करने लायक है कि नहीं.
मुझे नहीं लगता है कि किसी ने ऐसा किया और किया होता तो यह भी नहीं बताता कि उसकी बातचीत सार्वजनिक करने लायक नहीं है या वह हताशा में या किसी अन्य कारण से मानसिक तौर पर संतुलित नहीं लगता है. किसी युवा अधिवक्ता द्वारा यह जोखिम लिया जाना सामान्य नहीं है और उसकी हताशा (अगर थी) तो अकेले की नहीं होगी.
आप मानें या न मानें प्रबल प्रताप ने जो किया वह चाहे जितना अनुचित हो, उसका नाम इतिहास में उस पहले वकील के तौर पर दर्ज होगा, जिसने सुप्रीम कोर्ट में बेंच पर कागज फेंके, एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने का आदेश दिया और भारत के मुख्य न्यायाधीश को गाली दी.
भारत की सुप्रीम कोर्ट को ऐसा झटका अभी तक नहीं लगा था और कोई नहीं जानता था कि आखिर यह प्रबल प्रताप कौन है. अगर सुप्रीम कोर्ट इस बात पर आत्म-मंथन नहीं करता है कि वह इस स्थिति तक कैसे पहुंचा, तो स्थिति और खराब होगी. कुछ नहीं करना महंगा पड़ सकता है.
यह मामला इस बात का संकेत हो सकता है कि लोगों की सब्र का बांध टूट चुका है. इसे समझने और जरूरी कार्रवाई पर ध्यान नहीं दिया गया तो व्यवस्था चौपट हो जाएगी. इसका पता इस बात से भी चलता है कि वरिष्ठ पत्रकार विनीत नारायण ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ खबर की थी तो कार्रवाई हुई थी. खबर पर तो नहीं ही होनी थी, नहीं हुई.
अब स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ खबर सार्वजनिक है. तब उसपर कार्रवाई नहीं हुई, इस सूचना के आलोक में की गई सिफारिश को नहीं माना गया फिर भी वे मुख्य न्यायाधीश हैं और गाली पड़ गई.
यह तथ्य है कि पिछले कुछ समय में अवमानना के कई मामलों में कार्रवाई नहीं हुई है. इसे अदालतों का बड़प्पन बताया जाता रहा है लेकिन शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में जो हुआ वह बिल्कुल अलग है. भले संबंधित पीठ ने कहा कि हमें उससे सहानुभूति है, … हम उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करना चाहते.जहां तक मामले की बात है, हमें विवादित आदेश में दखल देने का कोई ठोस आधार नहीं मिला.
लेकिन मामला इतना सीधा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट को इसपर विचार करने की जरूरत है और स्पष्ट है कि देश के मुख्य न्यायाधीश की स्थिति कमजोर हुई है. उन्होंने कार्रवाई नहीं की यह उनका बड़प्पन होगा लेकिन कारणों पर विचार करना और उसे दूर करना देश हित में जरूरी है. वे दोषी के खिलाफ कार्रवाई न करें, देश के हालात पर विचार करें, कुछ करने की जरूरत है या नहीं उसपर बात करें जो जरूरी हो करें, जरूरी नहीं लगे तो लोगों को बताएं.
कई मामले हैं जिनपर कार्रवाई नहीं की गई है और अवमानना की कार्रवाई का डर या प्रभाव खत्म होता लग रहा है. अरविन्द केजरीवाल को जब चुनाव प्रचार के लिए जेल से राहत मिली थी तब भी आलोचना हुई थी. कार्रवाई नहीं हुई, उसकी जरूरत भी नहीं समझी गई पर अब वैसी स्थिति नहीं है.
वीडियो से यह स्पष्ट है कि प्रबल प्रताप को अदालत से कार्रवाई की उम्मीद नहीं थी, उसने कार्रवाई की अपील की ही नहीं, वह आदेश दे रहा था और संबंधित दस्तावेज भी उसने हवा में उड़ा दिए, सौंपे नहीं. गाली देते हुए कहा सीजेआई को दे देना. ऐसा व्यक्ति अदालत में आया क्यों, आने क्यों दिया गया– बहुत सारे सवाल हैं.
दूसरी ओर, चढ़ावा चोरी के मामले में पहले ही कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट जांच का काम सीबीआई को सौंप देगा. मैं नहीं जानता ऐसा होगा कि नहीं, यही सही उपाय है या विकल्प है पर फैसले में प्रवृत्ति दिखने लगी है– क्या यह सामान्य है. फैसला पहले से पता है तो कोर्ट का समय खराब करने की जरूरत है?
यह सही है कि कार्रवाई नहीं होने से हताशा होती है, सुप्रीम कोर्ट से उसने मांग की ही नहीं तो कार्रवाई कहां होती और अदालत ने अभद्रता तथा गाली देने के लिए कार्रवाई नहीं करने का निर्णय किया तो यह उसका विशेषाधिकार है लेकिन मीडिया वालों का काम था कि उससे मिलते, बात करते और पाठकों के लिए चीजों को स्पष्ट करते.
डिस्क्लेमरः लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह टिप्पणी उनके सोशल मीडिया एकाउंट से साभार लिया गया है.

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