Ranchi News : संताल आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए बनाए गए प्राचीन और अलिखित नियमों को अब दस्तावेजी रूप मिल गया है. बोकारो की 2000 फीट ऊंची लुगुबुरु पहाड़ी पर 12 वर्षों के मंथन के बाद बने इस मौखिक संविधान पर एक विस्तृत किताब तैयार की गई है. इस शोधपरक पुस्तक के जरिए दुनिया को पहली बार संतालों की इस समृद्ध विरासत की गहराई से जानकारी मिलेगी.
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वरिष्ठ पत्रकार ने किया है शोध
रांची के वरिष्ठ पत्रकार डॉ. सोमनाथ आर्य ने इस विषय पर गहरा शोध कर 350 पन्नों की कॉफी टेबल बुक लिखी है. इस पुस्तक का शीर्षक ‘लुगुबुरु घंटाबाड़ी : संताल आदिवासियों का संविधान’ रखा गया है. इसे ‘और एक प्रयास’ नामक संस्था प्रकाशित कर रही है. इस अहम कार्य में झारखंड सरकार के सांस्कृतिक कार्य निदेशालय ने भी अपना सहयोग दिया है.
राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने की सराहना
इस महत्वपूर्ण पुस्तक की प्रस्तावना स्वयं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने लिखी है. उन्होंने अपने लेख में आदिवासियों को दुनिया का प्रथम नागरिक बताते हुए लुगुबुरु को जड़ों से जोड़ने वाला पवित्र स्थल कहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस पहल को एक ऐतिहासिक कार्य बताया है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन सहित कई नेताओं ने भी इसे जनजातीय अस्मिता का अमूल्य दस्तावेज माना है.
पहाड़ी पर आज भी मौजूद हैं साक्ष्य
किताब में लुगुबुरु पहाड़ी पर मौजूद ऐतिहासिक प्रमाणों का विस्तार से वर्णन किया गया है. दोरबार चट्टान पर मौजूद उखल के निशान आज भी उस 12 साल लंबे वैचारिक मंथन की गवाही देते हैं. यहां मौजूद सीता नाला को गाय के दूध जितना पवित्र माना जाता है. इसके साथ ही धोरोम दोलान गुफा से साल भर पानी रिसता रहता है, जो इसकी महत्ता को बढ़ाता है.
14 देशों से पहुंचते हैं श्रद्धालु
इस शोध में फिनलैंड की कंपनी सॉफ्टा एआई और लुगुबुरु समिति के अध्यक्ष बबुली सोरेन ने भी मदद की है. लुगुबुरु को झारखंड में राजकीय महोत्सव का दर्जा प्राप्त है. हर साल कार्तिक पूर्णिमा के समय यहां 14 अलग-अलग देशों से लाखों श्रद्धालु अपनी आस्था लेकर जुटते हैं. समिति के अनुसार, इस बार के आयोजन में राष्ट्रपति के भी शामिल होने की तैयारी चल रही है.
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