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राष्ट्रीय जतरा महोत्सव में दिखी आदिवासी संस्कृति, पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे कलाकार

तिहासिक मोरहाबादी मैदान में दो दिवसीय राष्ट्रीय जतरा महोत्सव की शुरुआत शनिवार से हो गई है. जहां आदिवासी संस्कृति, परंपरा और लोककला का अनोखा संगम देखने को मिला. महोत्सव में रांची, तमाड़, खूंटी, गुमला, मांडर, कांके, बुटी समेत विभिन्न क्षेत्रों से जतरा में शामिल हुए.
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Ranchi: ऐतिहासिक मोरहाबादी मैदान में दो दिवसीय राष्ट्रीय जतरा महोत्सव की शुरुआत शनिवार से हो गई है. जहां आदिवासी संस्कृति, परंपरा और लोक-कला का अनोखा संगम देखने को मिला. महोत्सव में रांची, तमाड़, खूंटी, गुमला, मांडर, कांके, बुटी समेत विभिन्न क्षेत्रों से जतरा में शामिल हुए. इसमें 33 खोड़हा मंडलियों ने अपनी शानदार प्रस्तुति देकर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया. 

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बता दें, महोत्सव में कलाकार पारंपरिक वेशभूषा में सजे नजर आए. जो ढोल, नगाड़ा और मांदर की थाप पर नाचते-गाते जुलूस की शक्ल में मैदान पहुंचे. जैसे ही मंडलियों का प्रवेश हुआ, मैदान लोकसंगीत और नृत्य से झूम उठा. आयोजन समिति सूरज टोप्पो, संरक्षक रंजित टोप्पो, अशोक मुंडा, बाबूलाल महली, रवि मुंडा, कमिश्नर मुंडा, जठु मुंडा, खुदन मुंडा, सोनू मुंडा, संदीप मुंडा समेत अन्य अतिथियों ने सभी खोड़हा मंडलियों का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया.

 

राष्ट्रीय जतरा महोत्सव के संस्थापक अंतु तिर्की ने कहा कि यह महोत्सव आदिवासी कला, संस्कृति और भाषा को बचाने का सशक्त मंच है. तीसरे वर्ष में प्रवेश कर चुका यह आयोजन युवा पीढ़ी को जतरा से जोड़ने का प्रयास है, ताकि आदिवासी समाज की परंपरा, संस्कृति और रूढ़ियां आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रह सकें.

 

वहीं महोत्सव के अध्यक्ष नरेश पाहन ने कहा कि राष्ट्रीय जतरा को देश-विदेश तक पहचान दिलाने का लक्ष्य है. आदिवासियों की संस्कृति, धरोहर, जतरा और मसना ही उनकी असली पहचान और अस्तित्व हैं, जिन्हें सहेजना आज की सबसे बड़ी जरूरत है.

 

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