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वन विभाग के आतंक से परेशान आदिवासी, सीएम के वादों के बाद भी वन अधिकार से वंचित

Ranchi (Pravin Kumar) : झारखंड जनाधिकार महासभा ने सत्तारूढ़ दल झामुमो और कांग्रेस की सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया है. महासभा की ओर से कहा गया है कि दोनों दलों ने अपने घोषणा पत्रों में वन अधिकार कानून को सही से लागू करने एवं जंगल में रहने वाले आदिवासी-मूलवासियों को वन पट्टा देने का वादा किया था. इसको लेकर मुख्यमंत्री ने सरकार बनने के पूर्व और उसके बाद भी कई बार घोषणा की थी, लेकिन जमीनी स्थिति इन वादों के विपरीत है.

वन विभाग द्वारा आतंक मचाया जा रहा

अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 अंतर्गत वन आश्रित समुदायों के कई अधिकार हैं. उनमें से एक अधिकार है कि जो वन आश्रित लोग 13.12.2005 के पहले से वन भूमि पर स्वयं खेती करते रहे हैं और अपनी आजीविका के लिए वनों पर निर्भर हैं, वे उस जमीन (अधिकतम 4 हेक्टेयर) पर मालिकाना अधिकार के पात्र होंगे. 2008 में जब से यह कानून लागू हुआ, वन विभाग लोगों को उनके अधिकार से वंचित करने की कोशिश करता रहा है. कानून के शुरुआती दिनों में विभाग द्वारा आदिवासी-मूलवासियों पर केस मुकदमा और वन रोपण के नाम पर वन भूमि से बेदखल करने के अनेक मामले थे. दुःख की बात है कि अभी भी एक तरफ प्रशासन द्वारा आदिवासी-मूलवासियों को वन अधिकार से वंचित रखा जा रहा है. दूसरी ओर वन विभाग द्वारा आतंक मचाया जा रहा है.

लातेहार के बरियातू में नहीं मिला व्यक्तिगत पट्टा 

हाल में दो मामले सामने आए हैं. लातेहार जिला के बरियातू प्रखंड के गडगोमा गांव में 25 वन निवासी व्यक्तिगत वन पट्टों के लिए एवं गांव समाज की ओर से सामुदायिक वन अधिकार के लिए 2015 में पूर्ण अभिलेख के साथ आवेदन की कानूनी प्रक्रिया को पूरा करके अनुमंडल स्तरीय वन अधिकार समिति को जमा किए थे. लेकिन आज तक न व्यक्तिगत पट्टा मिला और न ही सामुदायिक.

7 दिसम्बर 2021 को किया गया था आवेदन

7 दिसम्बर 2021 को वन विभाग के कर्मी पट्टे के लिए आवेदन के बाद जमीन पर वन रोपण करने पहुंच गए. लोगों द्वारा विरोध करने पर उन्होंने धमकी दी कि केस दर्ज कर जेल भेज देंगे. 2022 में वन विभाग द्वारा जमीन पर पिट कोड़ना शुरू किया गया. 11 फ़रवरी 2022 को गांव की महिलाओं ने कुछ गड्ढों में मिट्टी भर दी. उसी दिन शाम को वन विभाग के अधिकारियों ने पुलिस बल के साथ आकर गांव के दो युवा पुरुषों – दिनेश राणा, पिता-प्रवेश राणा और रंजन राणा, पिता-अमेरिका राणा को पकड़ लिया. जब उन्हें थाना से अनुरोध कर छुड़ाने के लिए ग्रामीण पुलिस पिकेट बरियातू पहुंचे, तो वन विभाग के कर्मियों द्वारा उनके साथ धक्का-मुक्की की गयी. पिट भरने और सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में दोनों युवा व उनके पिता पर मामला दर्ज कर दिया गया. युवाओं को जेल भेज दिया गया. इसे भी पढ़ें -झारखंड">https://lagatar.in/there-is-a-special-atmosphere-of-enthusiasm-in-jharkhand-when-you-are-elected-president-ramesh-bais/">झारखंड

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वन विभाग कर रहा कानून का उल्लंघन

वन अधिकार क़ानून के धारा 4(5) में स्पष्ट उल्लेख है कि “जैसा अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय किसी वन में रहनेवाली अनुसूचित जनजाति या अन्य परंपरागत वन निवासियों का कोई सदस्य उसके अधीन वन भूमि से तब तक बेदखल नहीं किया जायेगा या हटाया जायेगा, जब तक मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं होती है”. यह स्पष्ट है कि वन विभाग खुलेआम कानून का उल्लंघन कर रहा है. कहा गया ऐसी ही स्थिति मनिका प्रखंड के बेयांग गांव की भी है. 40 अन्य परंपरागत वन अधिकार दावेदारों ने 2018 में व्यक्तिगत पट्टे के लिए और सामुदायिक अधिकार के लिए 2021 में दावा जमा किया था. लेकिन अभी तक उन्हें वन पट्टा नहीं मिला.

झारखंड जनाधिकार महासभा ने सरकार के समक्ष रखी मांग 

  • आदिवासी-मूलवासियों की कब्ज़े वाले वन भूमि पर वन रोपण के नाम पर लोगों को बेदखल करना बंद किया जाए
  • लंबित वन अधिकार दावों को अविलम्ब निपटाया जाए और वन अधिकार पत्र निर्गत किए जाए
  • निर्दोष लोगों पर वन विभाग द्वारा दर्ज सभी केस वापस लिया जाए. आदिवासी-मूलवासियों के वन अधिकारों व मानवाधिकार के उल्लंघन के ज़िम्मेवार वन विभाग के दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कानूनी करवाई की जाए.
  • वन अधिकारों को निहित करने की प्रक्रिया में वन विभाग के अधिकारियों के गैरकानूनी दखलन्दाज को बंद किया जाए.
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