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दुष्कर्म मामले में पिता समेत दो बरी, झारखंड हाईकोर्ट ने 25 साल की सजा भी समाप्त की

Ranchi News: हाईकोर्ट की खंडपीठ ने हरिराम शर्मा और लखीचंद प्रसाद की ओर से दायर क्रिमिनल अपील पर फैसला सुनाया. अदालत ने दोनों अपीलों को स्वीकार करते हुए विशेष पॉक्सो न्यायाधीश, बोकारो के 16 जनवरी 2026 के दोषसिद्धि संबंधी फैसले और 22 जनवरी 2026 को सुनायी गयी सजा को निरस्त कर दिया. दोनों आरोपी पहले से जमानत पर थे. अदालत ने उन्हें जमानत बॉन्ड की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया.
 
फाइल फोटो
  • साक्ष्यों की कमी और जांच में खामियां बनी आधार, सजा रद्द

Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने बोकारो के बालडीह थाना क्षेत्र में नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में पिता समेत दो सजायाफ्ता को बड़ी राहत दी है. अदालत ने मामले में निचली अदालत द्वारा सुनायी गयी सजा को रद्द करते हुए दोनों की दोषसिद्धि समाप्त कर दी है. बोकारो की निचली अदालत ने दोनों आरोपियों को पॉक्सो एक्ट की धारा 4(2) के तहत 25 साल के कठोर कारावास और धारा 6 के तहत प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक उम्रकैद की सजा सुनायी थी. साथ ही जुर्माना भी लगाया गया था.


हाईकोर्ट की खंडपीठ ने हरिराम शर्मा और लखीचंद प्रसाद की ओर से दायर क्रिमिनल अपील पर फैसला सुनाया. अदालत ने दोनों अपीलों को स्वीकार करते हुए विशेष पॉक्सो न्यायाधीश, बोकारो के 16 जनवरी 2026 के दोषसिद्धि संबंधी फैसले और 22 जनवरी 2026 को सुनायी गयी सजा को निरस्त कर दिया. दोनों आरोपी पहले से जमानत पर थे. अदालत ने उन्हें जमानत बॉन्ड की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया.


पीड़िता और उसकी मां पूर्व के बयानों से मुकर गयीं

अभियोजन के अनुसार, 15 मार्च 2025 की रात पीड़िता के पिता हरिराम शर्मा उसे डॉक्टर के पास ले जाने के बहाने स्कूटी से अपने साथ ले गये थे. आरोप था कि बाद में वह उसे अपने मित्र लखीचंद प्रसाद की कार में ले गये, जहां एक सुनसान पहाड़ी इलाके में उसके साथ दुष्कर्म किया गया. शिकायत में दोनों आरोपियों पर पीड़िता के साथ गलत हरकत करने और घटना का खुलासा करने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी देने का आरोप लगाया गया था.

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मामले में पुलिस ने जांच के बाद आरोप पत्र दाखिल किया था. ट्रायल के दौरान अभियोजन ने 15 गवाहों के बयान दर्ज कराये. हालांकि पीड़िता और उसकी मां सहित अधिकांश गवाह अपने पूर्व के बयानों से मुकर गये. पीड़िता ने अदालत में कहा कि उसके साथ दुष्कर्म या छेड़छाड़ की कोई घटना नहीं हुई थी और दोनों आरोपी निर्दोष हैं. उसकी मां ने भी प्राथमिकी में लिखी बातों का पूरी तरह समर्थन नहीं किया. अदालत ने कहा कि मेडिकल रिपोर्ट कथित दुष्कर्म की घटना को निर्णायक रूप से प्रमाणित नहीं करती.


सीसीटीवी फुटेज, डीएनए रिपोर्ट भी निर्णायक नहीं

अभियोजन ने सीसीटीवी फुटेज के आधार पर आरोपियों की गतिविधियों और एक सफेद रंग की कार के आने-जाने का उल्लेख किया था. फुटेज में हरिराम शर्मा को रात 9:04 बजे पीड़िता के साथ स्कूटी पर जाते हुए देखा गया था. वहीं एक सफेद कार को आर्य विहार सोसाइटी के पीछे पहाड़ी की ओर जाते और लौटते हुए दिखाया गया था.


खंडपीठ ने कहा कि सीसीटीवी फुटेज से यह प्रमाणित नहीं होता कि दोनों आरोपी और पीड़िता उसी कार में मौजूद थे. इसके अलावा कार के जाने और लौटने के समय में भी अंतर था, जिसका अभियोजन की ओर से कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया.

 

दर्ज बयान अकेले दोषसिद्धि का आधार नहीं

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 183 के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज पीड़िता का बयान अपने आप में ठोस या स्वतंत्र साक्ष्य नहीं है. इसका उपयोग अदालत में दिये गये बयान की पुष्टि या विरोधाभास दर्शाने के लिए किया जा सकता है. पीड़िता के ट्रायल के दौरान अपने पूर्व के बयान से मुकर जाने के बाद इस बयान को दोषसिद्धि का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता.


अदालत ने यह भी पाया कि आरोपियों के बयान दर्ज करते समय बीएनएसएस की धारा 51 के तहत अभियोजन के महत्वपूर्ण परिस्थितिजन्य साक्ष्य उनके सामने नहीं रखे गये थे. विशेष रूप से कार से पीड़िता को सुनसान स्थान पर ले जाने और कथित घटना को अंजाम देने से संबंधित परिस्थितियों पर उनसे स्पष्टीकरण नहीं मांगा गया था. इससे आरोपियों के बचाव के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा.


साक्ष्यों की कड़ियां कमजोर, दोषसिद्धि निरस्त

खंडपीठ ने कहा कि मामले में परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ियां कमजोर थीं और वे आरोपियों के अपराध को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थीं. अदालत ने यह भी माना कि मामले को दोबारा सुनवाई के लिए निचली अदालत में भेजने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अभियोजन के साक्ष्यों में ही गंभीर कमियां हैं.

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