Ranchi : झारखंड की जेलें इन दिनों सुधारगृह कम और शिकायतों का अड्डा ज्यादा बनती जा रही है. राज्य के विभिन्न जिलों से लगातार ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि जेल में बंद कैदियों और उनके परिजनों से मुलाकात, सामान पहुंचाने, बेहतर बैरक, इलाज तथा अन्य सुविधाओं के नाम पर अवैध वसूली की जा रही है.
सूत्रों का दावा है कि राज्य की सभी जेलों से हर सप्ताह 10 लाख रुपये से अधिक की अवैध वसूली की जा रही है. सबसे हैरानी की बात यह है कि शिकायतें मिलने के बावजूद कार्रवाई ना के बराबर होती है.
हाल के दिनों में मेदिनीनगर सेंट्रल जेल का एक वीडियो वायरल हुआ था. हजारीबाग जेल से भी कई शिकायतें सामने आईंं. अब कोडरमा मंडल कारा के एक कैदी ने भी आरोप लगाया है कि उसने जेल के एक पदाधिकारी को मोबाइल फोन के माध्यम से लाखों रुपये का भुगतान किया है.
कैदी का दावा है कि उसके जैसे कई अन्य कैदी भी विभिन्न सुविधाओं के नाम पर लाखों रुपये देने को मजबूर हैं. कैदी ने उपायुक्त (डीसी), पुलिस अधीक्षक (एसपी), जेल आईजी और मानवाधिकार आयोग को इस संबंध में पत्र लिखकर शिकायत की है और कई गंभीर आरोप लगाए हैं.
धनबाद और होटवार जेलों का नाम भी समय-समय पर विवादों में आता रहा है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह सब केवल संयोग है, या फिर जेलों के भीतर कोई ऐसा तंत्र सक्रिय है, जिसकी पकड़ इतनी मजबूत है कि शिकायतें दब जाती हैं और कार्रवाई फाइलों तक सीमित रह जाती है?
यदि एक-दो जेलों से शिकायतें आतीं तो उन्हें अपवाद माना जा सकता था, लेकिन जब राज्य के कई जेलों से एक जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं तो मामला गंभीर हो जाता है. आखिर हर बार कैदी और उनके परिजन ही आरोप क्यों लगा रहे हैं? हर बार जांच की बात तो होती है, लेकिन दोषियों की पहचान और उन पर हुई कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
सबसे चिंताजनक बात यह है कि जेल प्रशासन अक्सर इन आरोपों को खारिज कर देता है. यदि आरोप निराधार हैं तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? और यदि आरोप सही हैं, तो अब तक कितने जेल कर्मियों या अधिकारियों पर कार्रवाई हुई? यह जानकारी जनता के सामने क्यों नहीं आती? यही चुप्पी पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती है.
जेलों का उद्देश्य अपराधियों को कानून के दायरे में रखना और उनके सुधार की दिशा में काम करना है. लेकिन यदि जेल के भीतर हर सुविधा की कीमत तय हो जाए, तो यह व्यवस्था की विफलता मानी जाएगी. गरीब कैदी और उनके परिवार यदि अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए भी पैसे देने को मजबूर हों, तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के साथ भी खिलवाड़ है.
आज जरूरत इस बात की है कि जेल मुख्यालय केवल जांच के आदेश जारी करने तक सीमित न रहे. जिन जेलों पर आरोप लगे हैं, वहां की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए. शिकायतों की निगरानी किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए.
यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी दोषी पाया जाता है, तो उसके खिलाफ ऐसी कार्रवाई हो. क्योंकि सवाल केवल एक जेल या एक शिकायत का नहीं है. सवाल यह है कि क्या झारखंड की जेलों में कानून का राज चल रहा है या फिर पैसे का?
जब तक इस सवाल का स्पष्ट और पारदर्शी जवाब नहीं मिलेगा, तब तक जेलों से उठ रही वसूली की शिकायतें पूरे सिस्टम की साख पर दाग लगाती रहेंगी. शिकायतें बढ़ रही हैं, लेकिन कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही है. यही आज झारखंड की जेल व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल बन चुका है.
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