Patna: बिहार विधान परिषद चुनाव से पहले राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) और उसके अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के लिए बड़ा राजनीतिक झटका सामने आया है. बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री और उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को एनडीए की ओर से एमएलसी उम्मीदवार नहीं बनाया गया है. इसके साथ ही उनके मंत्री पद पर बने रहने को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे हैं.
सूत्रों के अनुसार बीजेपी ने उपेंद्र कुशवाहा को प्रस्ताव दिया था कि दीपक प्रकाश को बीजेपी कोटे से विधान परिषद भेजा जाए,लेकिन उन्हें बीजेपी के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ाना कुशवाहा को मंजूर नहीं था. इसके बाद बीजेपी ने अपने हिस्से की चारों सीटों पर उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए और दीपक प्रकाश का नाम सूची से बाहर रह गया.
दीपक प्रकाश फिलहाल न तो विधानसभा के सदस्य हैं और न ही विधान परिषद के उन्होंने 21 नवंबर 2025 को मंत्री पद की शपथ ली थी. संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत कोई भी व्यक्ति बिना विधायक या विधान पार्षद बने अधिकतम छह महीने तक ही मंत्री रह सकता है। ऐसे में मंत्री बने रहने के लिए उनका किसी सदन का सदस्य बनना जरूरी था.
एमएलसी चुनाव में टिकट नहीं मिलने के बाद राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि दीपक प्रकाश की मंत्री पद की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है. विपक्ष भी इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर है। बताया जा रहा है कि इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की गई है, जिसमें छह महीने की संवैधानिक समयसीमा पूरी होने के बाद मंत्री पद पर बने रहने पर सवाल उठाए गए हैं.
विधान परिषद चुनाव में आरएलएम के खाली हाथ रहने और दीपक प्रकाश के नामांकन नहीं करने से एनडीए के भीतर सीट बंटवारे और सहयोगी दलों की राजनीतिक हैसियत को लेकर भी नई बहस शुरू हो गई है. अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में सरकार और एनडीए इस पूरे मामले पर क्या फैसला लेते हैं.
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