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Valentine Day : इश्क की ये दास्तां पुरानी है…इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है

Lagatar Desk: किसी शायर ने क्या खूब कहा है- लोग पढ़ते हैं ताजा नजरों से/इश्क की दास्तां पुरानी है. जी हां, इश्क की दास्तां चाहे जितनी बार भी दुहराई जाए, उसमें ताजगी की खुशबू जरूर महसूस होती है. यह अहसास ऐसा है जिसकी अभिव्यक्ति के लिए शब्दों की दरकार नहीं होती. लब खुलने से पहले ही फिजा में एक अजब सी रूमानियत घुल जाती है. अहसास आंखों में जुगनू बन चमक उठते और परिस्थिति की तमाम नकारात्मकता जाने कहां उड़न छू हो जाती हैं. कुछ ऐसा ही अहसास हमने महसूस किया जब प्रेम को भरपूर जीने के बाद प्रेम विवाह करने और बाद में भी अपने अहसासों की ताजगी बनाए रखने वालों से बात की. निदा फाजली ने कहा है- इश्क कीजे फिर समझिए, जिंदगी क्या चीज है. सच पूछिए तो प्रेम करने और उसे मुकाम पर पहुंचाने वालों के अहसास से गुजरना भी जिंदगी के मायने समझाता है. वेलेंटाइन डे पर हमने यही कोशिश की, रू-ब-रू हुए इश्क की कुछ खूबसूरत दास्तां से.
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बचपन की मोहब्बत को दिल से न जुदा किया

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एक सुहानी सी सुबह जब पहली बार हमारी मुलाकात हुई. मैं अपने भईया के साथ उनके घर गई. वे सामने के कमरे में ही सो रहे थे. मेरी नजर उनके चेहरे पर टिक गई. कोई इस कदर मासूम हो सकता! हमारी आहट सुनकर उनकी नींद टूटी और वे भीतर के कमरे में चले गए. आलोक और मेरी पहली मुलाकात यही थी जब हमारी कोई बात नहीं हुई. तब हम दोनों स्कूल में थे.
अब कभी वे हमारे घर अपने भईया के साथ आ जाते कभी हम भाई-बहन उनके घर. दूसरे कई लोग भी होते, पर वे सभी क्रिकेट खेलने लगते और हम दोनों बातें करते, खूब सारी बातें करते. तब मोबाइल फोन का जमाना तो था नहीं, सो वीकएंड पर हमारी मुलाकातों में ही बातों का खजाना खुलता. धीरे-धीरे हम दोस्त और फिर बेस्ट फ्रेंड बन गए.
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आर-पार की लड़ाई

कहीं ये प्यार तो नहीं !

स्कूल की पढ़ाई पूरी होने के बाद हम दोनों आगे की पढ़ाई के लिए रांची आए. मैं हॉस्टल तो वे लॉज में रहने लगे. अब हर रविवार को हमारी मुलाकात होती, साथ घूमते. पर प्यार जैसी कोई फीलिंग नहीं थी. हालांकि रूममेट को लगता था कि यह रिश्ता फ्रेंड से कुछ अधिक का है. भाई को बैंक में नौकरी मिली तो उन्होंने मुझे एक छोटा मोटरोला मोबाइल फोन दिया. अब हमारी बातें फोन पर भी होने लगी. इसी बीच वेलेंटाइन डे आया. रूममेट ने भविष्यवाणी सी कर दी, देखना, आज आलोक का फोन जरूर आएगा. मैंने कहा, ऐसा कुछ नहीं और दोस्तों के साथ मस्ती करने लगी. दिन गुजरा, रात में हम सोने की तैयारी में थे. तभी दस बजे मोबाइल की घंटी घनघनाई. आलोक के पास फोन नहीं था, लेकिन अंजान नंबर देख कर भी मैं समझ गई, ये उनका ही फोन है. बातें सामान्य हुईं, पर मेरी धड़कन बढ़ गई थी. कहीं ये प्यार तो नहीं!
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की न्यूज डायरी।।14 FEB।।2 दिन के लातेहार प्रवास पर CM।।BJP में जाने से एतराज नहीं-सालखन।।भ्रष्टाचार की आशंका,CM को पत्र।।संथाल में NRC लागू करने की मांग।।किसानों को इनकम टैक्स से राहत।।समेत कई खबरें और वीडियो।।

इजहार का मौसम

अब थोड़ा ज्यादा आलोक से जुड़ गई. हम साथ फिल्म जाते, घूमते, बस में साथ घर आना जाना करते. इस दौरान मेरे प्रति उनका व्यवहार इतना केयरिंग होता कि मैं उनकी तरफ खिंचती चली गई. इसी बीच उनके पास भी एक फोन हो गया. अब हम खूब फोन पर बातें करते. इन्हीं बातों के बीच जाने क्या हो गया कि एक बार हमारे बीच जम कर बहस हो गई. मैं रो पड़ी. उस दिन हॉस्टल से लौट कर रात में सोई थी. तभी इनका मैसेज आया…सॉरी. इसके साथ ही वह मैसेज भी आया जिसका अबतक इंतजार कर रही थी. दुनिया का सबसे खूबसूरत तीन शब्द-आई लव यू. मैसेज पढ़ने भर की देर थी, मैंने भी जवाब दिया-आई लव यू टू.
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बढ़ गई संजीदगी

इश्क के इजहार के बाद दिन कुछ और थे. बेशक भावनाओं की अभिव्यक्ति आकाश में उड़ने को हमें मजबूर कर रही थीं. पर अभी हम अपने पंख तौल रहे थे. जिस उद्देश्य से रांची आए थे, उसे भूलना नहीं चाहते थे. करियर बनाना चाहते थे. इसलिए हमने अपने प्यार की बात दोस्तों और परिवार वालों से छिपायी और जम कर पढ़ाई में लग गए. जल्द ही मेरी नौकरी केंद्रीय विद्यालय में बतौर शिक्षिका हो गई. कुछ समय बाद ये भी बैंक में उच्च पद पर आसीन हो गए. पर मंजिल अभी भी दूर थी. अब घर में मैंने अपने प्यार के बारे में बताना शुरू किया. पर दो अलग जाति होने की वजह से परिवार वालों ने इसे स्वीकार नहीं किया. एक पल तो ऐसा भी आया जब हमने मम्मी-पापा के लिए परिवार को कुर्बान तक करने की सोची. बचपन से यही चाहा था कि मम्मी पापा को जमाने भी की खुशी दूं. पांव पर खड़ी हुई तो अपने पैसों से उन्हें दिल्ली, मसूरी, दार्जलिंग, गैंगटॉन्क की सैर करायी.
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मंदिर में हुई शादी

सब कुछ सही थी, पर इस सच्चाई से हम नकार नहीं सके कि हम बस एक दूजे के लिए ही बने हैं. एक दूसरे के बिना जिंदगी व्यर्थ लग रही थी. हमने दिल की आवाज सुनी और जिंदगी का कड़ा फैसला लिया. असम के एक मंदिर में वर्ष 2011 में हमने शादी कर ली. हमारी शादी में कोई बारात नहीं आई, मैंने लाल जोड़े नहीं पहने, मेहंदी नहीं रचाई, रस्मों के दौरान होने वाले चुहल-परिहास का आनंद नहीं लिया, कोई गीत-नाद नहीं हुआ, पर हम दिल से एक दूसरे के हुए. आज शादी के 13 साल हो गए. दो प्यारे-प्यारे बच्चे हैं. रांची में एक प्यारा सा घर भी हमने लिया. तमाम सुख-सुविधाएं हैं. मम्मी-पापा अब भी नाराज हैं. जॉब के कारण एक बार फिर अलग-अलग राज्यों में रहना हमारी मजबूरी है. पर तमाम दुश्वारियों के बावजूद हमारा प्यार अब भी वैसा ही ताजगी भरा है, उम्र, परिस्थितियों से परे, एक दूसरे पर जान लुटाता. अहसास और इजहार, दोनों वही शुरुआती दिनों वाले.
-पूनम निश्चल, शिक्षिका, केवी, हीनू
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हर दौर में सुनहरा रहा प्यार का रंग

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1992 में मैंने राष्ट्रीय सहारा (लखनऊ) ज्वॉइन किया. तब एक शख्स अक्सर मेरे डेस्क के पास आकर खड़े हो जाते, काम में मदद करते. ये राजेंद्र तिवारी थे. अक्सर मदद के बाद एक प्यारी सी उलाहना, अब चाय भी नहीं पिलाएंगी! तो हम साथ चाय की चुस्की भी अक्सर ले लेते. थोड़ा फ्रेश होकर फिर काम पर. कुछ समय बाद ऐसा भी होने लगा कि राजेंद्र ऑफिस से छुट्टी के बाद थोड़ी दूर तक छोड़ने लगे. कभी दोस्तों के साथ कॉफी शॉप पर कॉफी भी पीने लगे. इस दौर तक रिश्ता बस दो अच्छे कलीग या मित्रों -सा ही था.
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सामने नूडल्स और पीछे भैया

एक दोस्त की तबियत खराब हुई. किसी अन्य कलीग के साथ मैं उसे देखने जाने वाली थी. ऐन वक्त पर उस कलीग ने दो टूक कह दिया, मुझे फुर्सत नहीं, राजेंद्र खाली बैठा है, उसे ले जाओ ना. बस जनाब के साथ ही गई मैं, कलीग का हालचाल लिया. लौटते में भूख लग गई. एक बढ़िया रेस्त्रां में हम घुस गए. जिंदगी में पहली बार किसी लड़के के साथ रेस्त्रां अकेली गई थी. अजीब- सी धुकधुकी मन में लगी थी. नूडल्स ऑर्डर दिया. सामने प्लेट आ चुकी थी और हमने खाना शुरू किया. हम आमने- सामने बैठे थे. रेस्त्रां में काफी शोर था. किसी की बर्थडे पार्टी थी. एनट्रेंस की तरफ़ राजेंद्र का मुंह था. जैसे भइया ने एंट्री की, सबने हाथ हिलाया. मैंने पीछे पलटकर देखा, वो तो मेरे भइया थे. अब काटो तो खून नहीं. मुंह से निकला- भइया. जैसे ही भइया अपने सर्कल में पहुंचे, मैंने पर्स उठाया और बाहर निकल गई. कहीं भैया ने हमें देख तो नहीं लिया. घर लौटी तो मम्मी ने खाने को पूछा. तब मैंने कह दिया, सुनंदा को देखने गई थी. एक-दो लोग साथ थे, रास्ते में भूख लगी तो हमने कुछ खा लिया था. मन में तोड़ी तसल्ली हुई कि गर भैया ने देखा होगा तो कह दूंगी हम दोनों अकेले नहीं थे, दूसरा शख्स पहले उठ कर चला गया था. खैर, भैया ने नहीं देखा. बाद में आकाशवाणी का कार्यक्रम हो या कहीं पार्क जाना, हम साथ मिलने लगे.
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जब रिश्ता आया

इसीबीच एक रिश्ता आया हमारे लिए. लड़का इंजीनियर था और उसके अंकल मेरे पापा के दोस्त थे. बातों-बातों में उन्होंने कहा कि हमारे अजीज रामू भी तो राष्ट्रीय सहारा में हैं. रामू!!! ये कौन हैं भला. फिर जब गांव का नाम बताया तो मैं मुस्कुराई. अगले दिन दफ्तर जाते ही पूछा, और रामू जी, क्या हाल है? राजेंद्र अचकचाए, कि मैं उनका घरेलू नाम कैसे जानती हूं. फिर मैंने इन्हें बताया कि मेरा रिश्ता आया है. इसके चंद दिनों बाद ही एक कार्यक्रम के बाद हम कुकरैल पिकनिक स्पॉट गए तो राजेन्द्र ने टेस्टिंग के तौर पर मेरे बालों में पुटुस के फूल ये सोचकर लगाए अगर वीना के मन में भी होगा तो बालों में फूल लगाने से मना नहीं करेगी. किसी ने पहली बार मेरे बालों में फूल लगाए. हम बैठे थे कि अचानक राजेंद्र ने मेरी गोद में सिर रखकर पूछा, क्या हम ऐसे ही हमेशा साथ नहीं रह सकते, हम शादी कर सकते हैं? यह दिन था 28 सितंबर, 1993. मैंने हां कर दी.
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वह और यह दौर

फिर हम दोनों ने छुट्टी ली, एक बार फिर रेस्त्रां गए, लेकिन इस बार राजेंद्र के दोस्त भी थे. यह घटना भी इसलिए यादगार रही कि कुछ लोगों ने इसकी चुगली दफ्तर में कर दी. इसे हमने कैसे हैंडल किया, यह भी मजेदार रहा. इकरार तो हो गया, पर शादी के बंधन तक पहुंचने में तीन साल लग गए. मेरा परिवार राजी था, पर इनका परिवार नहीं. आखिरकार, 14 अक्टूबर,1996 को नवरात्र के दिनों में हमने शादी कर ली. तमाम अभावों के बावजूद हम खुश थे. दिल्ली आए. जब मेरे परिवार वालों को पता चला कि यहां हम जमीं पर सोते हैं, टीवी तक नहीं तो सामान देने की बात कही जिसे हमने ठुकरा दिया. भैया ने कहा, नया न सही, घर का पुराना कलर टीवी तो ले लो. दरअसल भैया म्यूजिक से मेरे लगाव को जानते थे कि मैं दिन भर गाने सुनती थी और आज संसाधन नहीं. टीवी घर आया पर टीवी की ट्रॉली नहीं थी, पेपर के ऊपर उसे हमने रखा. एक दौर ऐसा था कि सहारा के दफ्तर की सब्सिडी वाला टिफिन बॉक्स हमारा निवाला होता था. तमाम आर्थिक संकट के बाद भी हम हमेशा एक दूसरे के साथ खुश रहे, तब भी जब कुछ नहीं था, आज भी जब ईश्वर की दया से जिंदगी में कोई कमी नहीं.
-वीणा श्रीवास्तव, साहित्यकार
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अजीब सी लड़की के हाथों में थमा दी जिंदगी की डोर

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एक पागल सी लड़की जो पढ़ने में बहुत तेज थी, हमेशा बकबक करती रहती थी और फैशन सेंस जीरो था. पर कुछ था जो वह सबसे अलग थी, वह था रिश्तों के प्रति उसकी ईमानदारी और सच्चाई. बहुत ही सादगी से भरी हुई और सबको खुश रखने वाली लड़की. उसे जितना पढ़ाई करना पसंद था, उतना ही सुन्दर डांस भी करती थी. मुझे पसंद थे उसके ये गुण. कभी उसकी खूबसूरती से नहीं बल्कि उसकी पूरी छवि ही ऐसी थी कि आप उससे अनछुए नहीं रह सकते थे. हमारी लव स्टोरी शुरू होती है दरभंगा डेंटल कॉलेज से. यहां वर्ष 2006 में हम दोनों ने नामंकन लिया. वहां आकांक्षा (अब डॉ आकांक्षा चौधरी) और मैं, दोनों ने एडमिशन लिया.
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नाम पर सवाल!

वह स्कूटी से कॉलेज आती थी तो कॉलेज और आसपास के लोग उसे दूसरे ग्रह के प्राणी के तौर पर देखते थे. पहले सेमेस्टर में वह अपने बैच में टापर थी. दूसरे स्थान पर मै था, पर उसने कभी मुझे नोटिस नहीं किया था. एक दिन प्रैक्टिकल की क्लास में वह परेशां सी थी. उससे बार बार गलतियां हो रहीं थीं. अचानक मैंने उसके हाथ से काम लेकर कर दिया और कहा - "जाइए, हो गया!" वह वापस आई और मेरे पास खड़ी हो गई. कहा, मेरा नाम आकांक्षा है…मैंने बीच में ही रोक कर जवाब दिया - "हां, आप रांची से हैं और स्कूटी से आती हैं." फिर उसने मेरा नाम पूछा. मैंने जवाब दिया- धर्मवीर कुमार सिंह. उसने तपाक से कहा, बाप रे, इतना भारी नाम! किसने रखा! मैंने कहा, मेरे मां बाप ने, आपको कोई दिक्कत! वह झेंप गई. फिर धीरे धीरे हमारी दोस्ती हो गई. मैं गंभीर, वह चंचल, बेहद मिलनसार. पर एक चीज कामन थी हम दोनों में. पढ़ने के लिए पागल थे और परीक्षा परिणाम में एक दूसरे से आगे बढ़ने की स्वस्थ प्रतिस्पर्धा थी. ऐसे ही लड़ते झगड़ते हमने चार साल बिताए और पता भी नहीं चला कि कब दोस्ती प्यार में बदल गई.
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शक्कर में दूध की तरह घुल गई वह

हमने शादी का निर्णय लिया तो कई विषमताएं सामने आई. मैं एक बिहारी ग्रामीण खेतिहर परिवेश से था और वह बहुत ही पढ़े लिखे डॉक्टर इंजीनियर परिवार से. मैं सात भाई-बहनों वाला, वह इकलौती दुलारी संतान. उसकी मां यानि मेरी संप्रति सासू मां को डर था कि मेरी बेटी कैसे इतने उल्टे परिवेश में रह पाएगी. पर धीरे धीरे सभी बातें सही होतीं गईं. इंटर्नशिप के बाद हम दोनों शादी के बंधन में बंध गए. आज दस साल बाद हम दोनों एक बेटे और बेटी के साथ खुशहाल जीवन जी रहे हैं.
- डॉ धर्मवीर सिंह, डेंटिस्ट
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