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गुस्से में क्यों हैं युवा-दो : इंटर्न को मिला 54.3 करोड़ और प्रचार पर खर्च 46.7 करोड़

देश के युवा (जेन जी) गुस्से में हैं. हताश हैं. सरकार से नाराज हैं. सिर्फ एक आंदोलन या एक इस्तीफे से उनका गुस्सा, आक्रोश खत्म नहीं होगा. वह गुस्से में क्यों हैं, क्यों आत्महत्या कर रहे हैं? इसके कारणों को जानना जरुरी है. इसके लिए हमने एक सीरिज शुरु की है. आप भी कमेंट बॉक्स में लिख कर अन्य कारणों को गिना सकते हैं. बेरोजगार युवक अपनी कहानी लिख सकते हैं.
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क्या आपको पता है कि देश के युवाओं, बेरोजगारों के लिए चल रही योजनाओं का हाल क्या है. एक योजना पर दो साल में सरकार ने 123.7 करोड़ रूपया खर्च किया. इसमें से युवाओं को इंटर्नशीप के रुप में 54.3 करोड़ रुपया दिया गया, जबकि 46.7 करोड़ रुपया योजना के विज्ञापन पर खर्च किया गया है. यानी आधी रकम चेहरा चमकाने पर खर्च किया गया. योजना का हस्र यह है कि दो सालों में तीन चरणों में कुल 26,000 युवकों को स्टाइपेंड दिया गया. जबकि विज्ञापनों में बताया गया था कि पांच साल में एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशीप दिया जायेगा. 

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सपने बेचती सरकार

योजना देश के वैसे युवाओं के लिए लाया गया था, जो 12वीं, आइटीआई, डिप्लोमा, ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन करके नौकरी ज्वाइन करते हैं. ऑटोमोबाइल, बैंकिंग, एनर्जी, हॉस्पिटैलिटी, मैन्युफैक्चरिंग, आईटी, रिन्यूएबल्स, सेमी कंडक्टर्स जैसी 25 सेक्टर में काम मिलने पर सरकार ने इंटर्नशीप के रुप में 6000 रुपये देने का वादा किया था. साल 2024-25 में सरकार ने 2000 करोड़ रुपये बजट का प्रावधान किया था. जिसमें से सिर्फ 29.29 करोड़ ही खर्च किया जा सका. वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए सरकार ने 10,831.07 करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा, लेकिन खर्च हुआ सिर्फ 94.48 करोड़. दो सालों में खर्च हुआ सिर्फ 123 करोड़ रुपया. साफ है सरकार सिर्फ सपने बेचने का काम कर रही है. बजट राशि बढ़ा हुआ दिखाकर खर्च कम कर रही है. 


मोदी सरकार की यह योजना फेल कर गयी. क्योंकि सरकार की योजना में ही कमी थी. सरकार ने इंटर्नशीप के लिए शर्तें रखीं, वह छात्रों और कंपनियों के लिए पूरा करना संभव ही नहीं था. छोटे शहरों व छोटी कंपनियां किसी भी हाल में शर्त को पूरा कर ही नहीं सकते थे. और जो बड़ी कंपनियां है, जो शर्तों को पूरा कर सकते थे, वहां जाकर छात्रों के लिए रहना और स्किल सीखना संभव ही नहीं था. क्योंकि स्टाइपंड की राशि काफी कम थी. पहले छह हजार प्रतिमाह और बाद में इसे बढ़ाकर 9000 रुपया प्रति माह किया गया. 


क्या सरकार को नहीं पता था कि ऐसी योजनाएं चल ही नहीं सकती. क्या सरकार ने योजना बनाने से पहले कोई रिसर्च किया था. कंपनियों के प्रबंधन और युवाओं से बात की थी. जवाब ना में. यह सरकार ऐसे ही काम करती रही है. टेबल पर योजना तैयार करो. योजना का खूब प्रचार-प्रसार करो. चेहरा चमकाओ और बाद में भूल जाओ. फिर से नई योजना लेकर आओ. युवाओं में गुस्से की एक बड़ी वजह यह भी है कि उनके लिए बनी योजनाएं सफल ही नहीं होतीं.

 

देश के युवा (जेन जी) गुस्से में हैं. हताश हैं. सरकार से नाराज हैं. सिर्फ एक आंदोलन या एक इस्तीफे से उनका गुस्सा, आक्रोश खत्म नहीं होगा. वह गुस्से में क्यों हैं, क्यों आत्महत्या कर रहे हैं? इसके कारणों को जानना जरुरी है. इसके लिए हमने एक सीरिज शुरु की है. आप भी कमेंट बॉक्स में लिख कर अन्य कारणों को गिना सकते हैं. बेरोजगार युवक अपनी कहानी लिख सकते हैं.

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