नोएडा के डीएम मेघा रुपम को सुप्रीम कोर्ट में प्रीविलेज क्यों मिला? यह सवाल न्यायिक कार्य से जुड़े जजेज व अधिवक्ताओं, ब्यूरोक्रेसी, राजनीतिक हलकों व सिविल सोसाइटी में बहस का मुद्दा बना हुआ है. जो तथ्य सामने आ रहे हैं, वह बेहद गंभीर हैं.
तथ्य
- - सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सतीश चन्द्र शर्मा ने मेधा रूपम के मामले में सुनवाई करते हुए उन्हें दो राहतें दी.
- - पहली राहत उनके खिलाफ हाईकोर्ट के आदेश से लगा जुर्माना और सख्त टिप्पणियों को स्टे कर दिया गया.
- - दूसरी राहत यह थी कि कोर्ट की सुनवाई के वक्त माइक म्यूट कर दिया गया जिससे कोर्ट में सुनवाई के दौरान का संवाद बाहर ना जाये.
जस्टिस शर्मा व मेघा रुपम के बीच कनेक्शन
- - जस्टिस सतीश चन्द्र शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा मध्यप्रदेश में निर्वाचन आयोग के इम्पैनल्ड वकील है.
- - मेधा रूपम के पिता ज्ञानेश कुमार भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त हैं.
लॉयर्स एसोसिएशन फॉर कंस्टीट्यूशन का सवाल
- - सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की प्रचलित रोस्टर व्यवस्था के अनुसार यह मामला उस न्यायलय के समक्ष नहीं आता, जिसमें सूचीबद्ध किया गया.
- - ऐसा लगता है इस मामले को विशेष रुप से एक विशेष पीठ को सौंपा गया. मामले का अनियमित या आउट-ऑफ-टर्न सूचीबद्ध होना विशेष व्यवहार का संकेत देता है.
- - न्यायालय में सुनवाई सार्वजनिक होती है. यह विशेष रुप से वीडियो कांफ्रेंसिंग सुविधा के माध्यम से संभव होता है. ऐसे में वीडियो कांफ्रेंसिंग सुविधा को म्यूट करना चिंता का विषय है.
एक और मामला है, वह यह कि मुख्य चुनाव की नियुक्ति को लेकर जो याचिका सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल किया गया, उसकी सुनवाई जस्टिस शर्मा की बेंच ने की थी. उन्होंने इस मामले में किसी तरह का निर्णय नहीं दिया और मामला कंस्टीट्यूशन बैंच को भेज दिया.
तथ्यों, जस्टिस शर्मा और नोएडा डीएम मेघा रुपम को लेकर जो सवाल उठ रहे हैं, वह देश की सर्वोच्च न्यायालय की साख पर बट्टा लगने जैसा है. क्या जस्टिस शर्मा ने ऐसे मामले में पोटेंशियल कनफ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट (Potential Conflict or Interest या परसिव्ड कनफ्लिक्ट (Perceived Conflict) को लेकर डिस्क्लोजर, क्लैरिफिकेशन या रिक्यूजल का सावल नहीं उठता? इस मामले में ऐसा कुछ भी क्यों नहीं किया गया गया? तो क्या इस तरह का प्रोफेशनल कनेक्शन केवल संयोग है? या निष्पक्षता के लिहाज से इस पर चीजें साफ होनी चाहिए.
