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जी, हां योर ऑनर, आपको क्या लगा इंसान हैं, नहीं हम कॉकरोच ही हैं!

भारत के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने 15 मई को कहा कि देश के बेरोजगार, जो कुछ कर नहीं पाते वह पत्रकार बन जाते हैं, एक्टिविस्ट बन जाते हैं, आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर सिस्टम पर हमला करते हैं. संदर्भ चाहे जो भी हो, उनके इस बयान से दुखी होना तो लाजिमी है, लेकिन उन पर तरस भी आती है. तरस आती है उनके चीफ जस्टिस होने पर भी.
 

भारत के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने 15 मई को कहा कि देश के बेरोजगार, जो कुछ कर नहीं पाते वह पत्रकार बन जाते हैं, एक्टिविस्ट बन जाते हैं, आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर सिस्टम पर हमला करते हैं. संदर्भ चाहे जो भी हो, उनके इस बयान से दुखी होना तो लाजिमी है, लेकिन उन पर तरस भी आती है. तरस आती है उनके चीफ जस्टिस होने पर भी. 

 

और तरस आती है, इस देश के बेरोजगारों, हम जैसे पत्रकारों और एक्टिविस्टों पर. क्योंकि इस बयान के खिलाफ शोर सिर्फ सोशल मीडिया पर है. एक्स पर है. फेसबुक पर है. इंस्टाग्राम पर है. यानी सिर्फ आभासी दुनिया में. सीजेआई के बयान से किसी के असल जिंदगी में कुछ फर्क पड़ा है, ऐसा दिख नहीं रहा. 

 


सवाल तो यह उठना चाहिए कि जो लोग जोंक की तरह सिस्टम से चिपके हुए हैं और उसी सिस्टम का खून पीकर उसे खोखला कर रहे हैं, वैसे लोग देश के करोड़ों लोगों का मजाक कैसे उड़ा सकते हैं. उन करोड़ों लोगों का, जिनके टैक्स (डायरेक्ट व इन डायरेक्ट) की वजह से उनके घर का चुल्हा जलता है. वो कैसे मजाक उड़ा सकता है, जो खुद के बच्चे को भी सिस्टम का जोंक बना देता है. और जब उनसे सवाल पूछे तो सबको कॉकरोच, परजीवी कहा जाता है. यह सब पब्लिक में दिखता है. 

 

वैसे सीजेआई ने ठीक ही कहा है कि सच में ऐसे लाखों-करोड़ों लोग कॉकरोच बन गये हैं. शायद कॉकरोच से भी गये गुजरे. क्योंकि इनकी सोचने-समझने की क्षमता ही खत्म हो गई है. ये काल्पनिक रील में खोए रहने वाले हैं. राष्ट्रवाद और धर्म की भांग पीकर मस्त रहने वाले हैं. मोबाइल पर दिन का सात घंटा खर्च करने वाले. शिक्षा से मतलब नहीं. पढ़ने से मतलब नहीं. हेल्थ सुविधा है या नहीं जानने की जरूरत नहीं. इन्हें तो बस मतलब है जैसे-तैसे पैसा कमाकर दो चार सीढ़ी ऊपर पहुंचने की. 

 

अगर देश के बेरोजगार, पत्रकार व एक्टिविस्ट ऐसा नहीं होते तो शायद ही कोई जज, नेता, पीएम, सीएम इस तरह के शब्द बोल पाते. सीजेआई ने जो कहा है, वह सिर्फ आहत करने वाले शब्द नहीं हैं, बल्कि यह एक टेस्ट है. यह टेस्ट है सिस्टम का. यह टेस्ट है सत्ता का. वह टेस्ट ले रहा है कि ये कॉकरोच कैसे रिएक्ट करते हैं. विरोध करने लायक बचे भी हैं या नहीं? वह जानना चाहते हैं कि इन कॉकरोचों में स्वाभिमान बचा भी है या नहीं? वह आवाज उठा सकता भी है या नहीं. और ऐसा लगता है, सत्ता और सिस्टम इस बार अपने टेस्ट के रिजल्ट को सुधार चुका है. अब तैयार रहिये, आगे चल कर आपकी तुलना कीड़े-मकौड़े से होगी.

 

 

 

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