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बिना सीमेंट-बालू के खड़ा 1000 वर्ष पुराना शिव मंदिर, झींझी पहाड़ी पर आस्था और कला का अद्भुत संगम

Dhanbad: जिले के कतरास स्थित झींझी पहाड़ी पर विराजमान भगवान शिव का प्राचीन मंदिर न सिर्फ आस्था का केंद्र है बल्कि लगभग एक हजार वर्ष पुरानी स्थापत्य कला का अनूठा उदाहरण भी प्रस्तुत करता है. मान्यता है कि इसका निर्माण दसवीं शताब्दी के आसपास हुआ था. करीब 28 फीट ऊंचा यह मंदिर पूरी तरह पत्थरों को एक-दूसरे के ऊपर सलीके से रखकर बनाया गया है. मंदिर के निर्माण में न तो सीमेंट न ही बालू का उपयोग किया गया है.

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मंदिर के गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग की शैली, ओडिशा के प्रसिद्ध कलिंगा मंदिर शैली से मिलती-जुलती बताई जाती है. पत्थरों पर उकेरी गई प्राचीन कलाकृतियां और शिलालेख इसकी ऐतिहासिक महत्ता को प्रमाणित करते हैं. यह दो तल का मंदिर है. निचले तल पर भगवान भोलेनाथ का शिवलिंग और मां पार्वती का विग्रह स्थापित है.

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यहां स्थापित शिवलिंग जमीन से लगभग दो फीट ऊंचाई पर स्थित है, जो इसे अन्य शिवलिंगों से अलग बनाता है. स्थानीय लोग इसे ‘मनोकामना शिवलिंग’ के नाम से भी जानते हैं.

 

मंदिर के पुजारी आशीष कुमार चक्रवर्ती के अनुसार यह मंदिर लगभग 900 वर्ष पुराना है. लोककथाओं के अनुसार मंदिर का निर्माण एक ही रात में हुआ था, लेकिन सुबह हो जाने के कारण इसका गुंबद अधूरा रह गया. पूर्वजों से मिली जानकारी के मुताबिक यह संरचना पूरी तरह पत्थरों से निर्मित है और इसमें किसी भी आधुनिक सामग्री का प्रयोग नहीं किया गया. 


उन्होंने बताया कि मंदिर से जुड़ी एक और मान्यता प्रचलित है. कहा जाता है कि जिस स्थान से पत्थर निकालकर मंदिर का निर्माण किया गया. वहां आज भी तालाब और कुआं मौजूद है. मंदिर परिसर स्थित कुएं का पानी ग्रामीण पेयजल के रूप में उपयोग करते हैं, जबकि पास के तालाब का पानी स्नान के लिए प्रयोग किया जाता है. महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां झारखंड के विभिन्न जिलों के साथ-साथ पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तरप्रदेश से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं.

 

श्री श्री बुढ़ा बाबा मंदिर सेवा समिति ट्रस्ट के अध्यक्ष लखन प्रसाद महतो ने बताया कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के प्रतिनिधियों ने मंदिर का निरीक्षण कर रिपोर्ट तैयार की है. उन्होंने आशंका जताई कि प्राकृतिक प्रभाव और भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) की ओपन कास्ट खदानों में होने वाली ब्लास्टिंग से उत्पन्न कंपन के कारण मंदिर को नुकसान पहुंच सकता है. समय के साथ पत्थरों की कलाकृतियां भी धूमिल हो रही हैं. उन्होंने मंदिर के संरक्षण और सौंदर्यीकरण की मांग की है.

 

वहीं धनबाद उपायुक्त आदित्य रंजन ने बताया कि प्रस्ताव को डिस्ट्रिक्ट टूरिज्म प्रमोशन काउंसिल से पारित कर राज्य सरकार को भेज दिया गया है. स्वीकृति मिलने के बाद इसे नोटिफाइड टूरिस्ट प्लेस घोषित किया जाएगा. इसके पश्चात एएसआई को विस्तृत प्रस्ताव भेजकर संरक्षण एवं विकास की व्यापक योजना तैयार की जाएगी.

 

झींझी पहाड़ी का यह प्राचीन शिव मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं बल्कि क्षेत्र की समृद्ध, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है. बिना आधुनिक तकनीक के निर्मित यह अद्भुत संरचना आज भी अपनी मजबूती और कलात्मकता से लोगों को आकर्षित कर रही है. हालांकि समय और खनन गतिविधियों से मंदिर को खतरा बना हुआ है.

 

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