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DSPMU में आदिवासी जीवन पर आयोजित हुआ राष्ट्रीय संगोष्ठी

स्नातकोत्तर हिंदी विभाग, DSPMU तथा उच्च व तकनीकी शिक्षा विभाग, झारखंड सरकार के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया.
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Ranchi : स्नातकोत्तर हिंदी विभाग, DSPMU तथा उच्च व तकनीकी शिक्षा विभाग, झारखंड सरकार के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी का विषय “21वीं सदी के हिंदी साहित्य में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन संदर्भ” रहा. 

 

कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों द्वारा पारंपरिक रूप से नगाड़ा बजाकर की गई. इसके बाद सभी अतिथियों को शॉल और मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया. स्वागत अभिभाषण देते हुए स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के अध्यक्ष और संगोष्ठी के सचिव जिंदर सिंह मुंडा ने अतिथियों, शोधार्थियों और छात्रों का स्वागत किया. 

 

उन्होंने कहा कि संगोष्ठी के दौरान साहित्य, सिनेमा और पत्रकारिता के माध्यम से आदिवासी जीवन पर जो निष्कर्ष सामने आएंगे, उन्हें समाज और राष्ट्रहित के परिप्रेक्ष्य में सरकार एवं संबंधित संस्थाओं को एक विशेष रिपोर्ट के रूप में भेजा जाएगा.

 

संगोष्ठी के पहले सत्र का विषय “हिंदी कथा-साहित्य में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन संदर्भ” रहा. इस सत्र में वरिष्ठ साहित्यकार रणेंद्र कुमार, महादेव टोप्पो, डॉ. पंकज मित्र और बेचन उरांव ने अपने विचार रखे.

 

वरिष्ठ आदिवासी साहित्यकार महादेव टोप्पो ने आदिवासी अस्तित्व से जुड़ी वैश्विक घटनाओं को कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत किया और औपनिवेशिक ताकतों के विरुद्ध हुए आदिवासी विद्रोहों को रेखांकित किया. उन्होंने नए लेखकों से ऐसा साहित्य रचने का आह्वान किया, जिससे धरती और अधिक सुंदर बन सके.

 


डॉ. पंकज मित्र ने कहा कि आदिवासी समुदाय अपनी पूरी रचनात्मकता के साथ हिंदी कथा साहित्य में उभर कर सामने आ रहा है. उन्होंने आदिवासी और गैर-आदिवासी लेखन के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि आदिवासी समाज में प्रकृति पर विजय की नहीं, बल्कि सहचर की भावना निहित है. 

 

नेपाल के सामाजिक कार्यकर्ता बेचन उरांव ने नेपाल के आदिवासी समुदाय की भाषाओं और संस्कृति पर मंडरा रहे खतरों की ओर ध्यान दिलाया. जर्मनी से ऑनलाइन जुड़े नेतरा पौडियाल ने जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन के माध्यम से वैश्वीकरण के प्रभावों पर प्रकाश डाला.

 

अध्यक्षीय वक्तव्य में वरिष्ठ साहित्यकार रणेंद्र कुमार ने सभी वक्तव्यों का सार प्रस्तुत करते हुए कहा कि भाषा का अत्यधिक शुद्धिकरण ही उसके विलुप्त होने का एक कारण बनता है. उन्होंने लेखकों से “डिकोलोनाइज” होकर सोचने और यथार्थवाद से हटकर जादुई कल्पना से प्रेरित नई कृतियां रचने का सुझाव दिया.

 

दूसरे सत्र का विषय “हिंदी सिनेमा/मीडिया में अभिव्यक्त आदिवासी जीवन संदर्भ” रहा. इस सत्र में डॉ. विनोद कुमार, डॉ. जनार्दन गोंड, प्रो. मिथिलेश कुमार सिंह, निरंजन कुजूर और फिल्मकार पुरुषोत्तम कुमार ने अपने विचार साझा किए.

 

फिल्मकार पुरुषोत्तम कुमार ने हिंदी सिनेमा में आदिवासियों के नकारात्मक चित्रण का कारण उनकी अपर्याप्त भागीदारी बताया. उन्होंने कहा कि आदिवासी परिवेश से आने वाले लोगों द्वारा बनाई गई फिल्मों से ही समाज का सही चित्रण संभव है.

 

डॉ. सुदर्शन यादव ने सिनेमा में “ट्राइबल रिप्रेजेंटेशन और स्टीरियोटाइप” पर वक्तव्य देते हुए कहा कि हिंदी फिल्मों में आदिवासियों को प्रायः नक्सली दृष्टिकोण से ही दिखाया गया है. फिल्मकार निरंजन कुजूर ने इस दोहरे मापदंड पर सवाल उठाया कि विदेशी फिल्मों में गलत चित्रण पर विरोध करने वाले फिल्मकार अपनी ही फिल्मों में आदिवासियों का गलत चित्रण क्यों करते हैं.

 

डॉ. जनार्दन गोंड ने कहा कि झारखंड में आदिवासी साहित्य के साथ-साथ आदिवासी सिनेमा का भी केंद्र बनने की पूरी क्षमता है. प्रो. मिथिलेश कुमार सिंह ने हिंदी मीडिया में आदिवासी चित्रण पर पूंजीवाद और मीडिया के गठजोड़ की आलोचनात्मक समीक्षा प्रस्तुत की.

 

संगोष्ठी में कुल 300 प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया, जिनमें से लगभग 200 शोधार्थियों ने शोध पत्रों का वाचन किया. इसमें गुजरात, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, बंगाल, बिहार, झारखंड सहित नेपाल से भी प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया. संगोष्ठी में प्रस्तुत आलेखों को पुस्तकाकार प्रकाशित करने का निर्णय लिया गया है.

 

मंच संचालन हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. मृत्यंजय कोइरी और विजय कुमार ने संयुक्त रूप से किया. समापन समारोह में विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों के शिक्षक, शोधार्थी, छात्र और सैकड़ों साहित्य प्रेमी उपस्थित रहे.

 


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