Sheetal P Singh
IDBI के बाद किस बैंक की बारी? यह सवाल अब भारत की बैंकिंग व्यवस्था के भविष्य से जुड़ा है. सरकार ने IDBI की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा के Fairfax समूह की कंपनी को करीब ₹52,878 करोड़ में बेचने की मंजूरी दी है. सौदा पूरा होने पर बैंक का नियंत्रण निजी हाथों में जाएगा.
इसकी पृष्ठभूमि याद रखिए. सरकार ने 2021 के बजट में IDBI के अलावा दो सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के निजीकरण का प्रस्ताव भी रखा था. यानी सरकारी बैंकों में निजीकरण का विचार IDBI तक सीमित नहीं रहा है.
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आगे की संभावनाओं पर बैंकिंग विशेषज्ञों की चर्चा में बैंक ऑफ महाराष्ट्र, सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया, इंडियन ओवरसीज बैंक, यूको बैंक और पंजाब एंड सिंध बैंक के नाम आते हैं. लेकिन इन पांचों को बेचने की कोई घोषित सरकारी सूची नहीं है. इन्हें संभावित उम्मीदवार माना जाना और इनकी बिक्री तय होना अलग बातें हैं.
बैंक ऑफ महाराष्ट्र में सरकार ने दिसंबर 2025 में छह प्रतिशत तक हिस्सेदारी बेचने की पेशकश भी की थी. हालांकि कुछ शेयर बेचकर सरकारी नियंत्रण बनाए रखना और पूरा प्रबंधन निजी मालिक को सौंप देना एक जैसा फैसला नहीं है.
इसीलिए IDBI के अनुभव की गंभीर समीक्षा जरूरी है. जब ये बैंक संकट में थे तब सार्वजनिक संस्थाओं (LIC) ने हमारा आपका पैसा लगाया, बैंक को सहारा मिला और वह मुनाफे में आया. अब सवाल है कि इस सुधार का लंबे समय का लाभ जनता को किस रास्ते से ज्यादा मिलेगा? हिस्सेदारी बेचने से या भविष्य की कमाई में अपना अधिकार बनाए रखने से?
इसका जवाब सिर्फ यह जोड़कर नहीं मिलेगा कि इतने हजार करोड़ लगाए और उससे ज्यादा में शेयर बेच दिए. पैसा कब लगाया गया, तब और अब में उस पैसे का डॉलर के समक्ष क्या मूल्य था/है? पहले से मौजूद हिस्सेदारी की लागत क्या थी, कितना लाभांश मिला, आगे कितना लाभ मिल सकता था और कितनी नई पूंजी की जरूरत पड़ती, पूरा हिसाब चाहिए, वह कहां है?
IDBI ने पिछले तीन वित्त वर्षों में करीब ₹22,662 करोड़ का शुद्ध लाभ कमाया है. भविष्य का लाभ निश्चित नहीं होता, लेकिन इतनी कमाई करने वाले बैंक की बिक्री पर भविष्य की आय का सवाल उठना बिल्कुल स्वाभाविक है.
सरकारी बैंक की कीमत उसके शेयरों तक भी सीमित नहीं है. गांव की शाखा, छोटे किसान और दुकानदार तक कर्ज की पहुंच तथा संकट में सरकारी योजनाओं को लागू करने की क्षमता भी सार्वजनिक मूल्य रखती है. निजीकरण के बाद इन जिम्मेदारियों को कैसे निभाया जाएगा, इसकी कोई स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए कि नहीं?
निजी पूंजी और बेहतर तकनीक का स्वागत हो सकता है. मगर सार्वजनिक बैंक का नियंत्रण सौंपते समय सरकार को साबित करना चाहिए कि जनता को मिलने वाला लाभ उसके हाथ से जाने वाली संपत्ति, आय और नीतिगत क्षमता से अधिक है.
आज IDBI पर पूछा गया यह सवाल कल दूसरे बैंकों पर भी लागू होगा. जनता के पैसे से सुधरी संस्था का भविष्य तय करते समय जनता के हित का पूरा हिसाब कहां है?

