- सीएम ने कार्यकर्ताओं को भेजा संदेश, कहा- मेरी प्रतिष्ठा का सवाल
- जोबा मांझी को महागठबंधन का प्रत्याशी बनाने से गीता कोड़ा की राह हुई मुश्किल
Adityapur (Sanjeev Mehta) : जोबा मांझी को चाईबासा सीट से प्रत्याशी बनाये जाने से यह सीट हॉट केक बन गया है. मुख्यमंत्री चम्पई सोरेन ने यहां जोबा मांझी को प्रत्याशी बनाकर दांव लगाया है. उन्होंने मंगलवार को ही कार्यकर्ताओं को संदेश भेजकर कहा है कि अब मेरी प्रतिष्ठा का सवाल है. बता दें कि जोबा मांझी के महागठबंधन का प्रत्याशी बनने से गीता कोड़ा की राह मुश्किल हो गई है. चूंकि जोबा मांझी भी सिंहभूम की जमीन से जुड़ी महिला नेत्री हैं. उनकी गिनती सिंहभूम क्षेत्र की कद्दावर महिला नेता के रूप में होती है. वहीं गीता कोड़ा साफ सुथरी छवि की हैं, लेकिन उनके पति पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की छवि दागदार है. वे जेल यात्रा भी कर चुके हैं. जबसे झामुमो ने जोबा मांझी को प्रत्याशी घोषित किया है, चर्चाओं का बाजार गर्म है.
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सरायकेला विस क्षेत्र में झामुमो की है पकड़
चाईबासा लोकसभा क्षेत्र का मुख्य हिस्सा सरायकेला विधानसभा क्षेत्र है. यहां से झामुमो लगातार जीतती रही है. दो बार लक्ष्मण टुडू और दो बार गणेश महाली को हराकर मुख्यमंत्री चम्पई सोरेन लगातार 4 बार से यहां चुनाव जीतते रहे हैं. वर्तमान में वे मुख्यमंत्री हैं, जिसका लाभ जोबा मांझी को मिलने की संभावना है. प्रत्याशी बनाने के साथ ही मुख्यमंत्री ने 13 और 14 अप्रैल को दो दिन आदित्यपुर और गम्हरिया में कार्यकर्ता सम्मेलन भी बुलाया है. इससे प्रतीत होता है कि यहां जोबा मांझी नहीं बल्कि मुख्यमंत्री चम्पई सोरेन चुनाव लड़ रहे हैं. उन्होंने कार्यकर्ताओं को अभी से कमर कस लेने का संदेश भी भेजवा दिया है.
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कौन हैं जोबा मांझी
पहली बार जोबा 1998 में अविभाजित बिहार में राबड़ी देवी की सरकार में आवास राज्य मंत्री बनी थीं. इसके बाद उन्हें 2000 में अलग झारखंड राज्य बनने के बाद बाबूलाल मरांडी की सरकार में समाज कल्याण व महिला बाल विकास तथा पर्यटन मंत्री बनाया गया. 2005 में भी जोबा मांझी परिवार व समाज कल्याण व महिला बाल विकास मंत्री बनीं.
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पति देवेंद्र मांझी थे विधायक, पत्नी जोबा हाट में बेचती थी सब्जी
साम्यवादी विचारधारा के समर्थक देवेन्द्र माझी ने अपनी जिंदगी में जनप्रतिनिधियों के लिए एक आदर्श प्रस्तुत किया था. यह आदर्श भी इतना कठिन कि आज के नेताओं के पसीने छूट जाएं. उन्होंने अपनी पत्नी को भी इन्हीं आदर्शों की घुट्टी पिलाई है. वर्ष 1982 में विवाह के उपरांत देवेन्द्र माझी की इसी सोच का नतीजा था कि अपने खेतों में उपजी सब्जियां लेकर जोबा माझी स्वयं इतवारी बाजार के खुदरा विक्रेताओं को बेचकर आती थीं. जबकि वर्ष 1980 से 1990 तक देवेन्द्र माझी विधायक हुआ करते थे. उनके आचार-विचार की तुलना वर्तमान जनप्रतिनिधियों से की जाए, तो फर्क स्पष्ट नजर आता है. आज के अधिकतर जनप्रतिनिधि शाही ठाठ से रहने के आदी हो गए हैं. इतवारी बाजार के सब्जी विक्रेता बताते हैं कि जोबा भाभी देवेन्द्र बाबू के विधायक रहते स्वयं सब्जियां लेकर बेचने आती थीं. आधे एक घंटे में सब्जियों की बिक्री कर तमाम लोगों का कुशलक्षेम पूछकर वापस लौटती थीं. जोबा माझी कहती हैं कि माझी साहब के विचार बेहद सुलझे हुए थे. वे कहते थे कि मैं विधायक हूं, इस बात से अपनी आजीविका व रोजमर्रा के कार्यों में कोई बदलाव नहीं होना चाहिए. कर्म पर उनका अटूट विश्वास था. आज भी जोबा माझी को लोग उनके पंप रोड स्थित आवास में बर्तन मांजते, कपड़े धोते व गोबर की लिपाई करते देखते हैं, जबकि वे झारखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री के महत्वपूर्ण पद पर रह चुकी हैं.
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गीता से पति मधु कोड़ा को मिली मदद
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alt="" width="600" height="400" /> भाजपा प्रत्याशी गीता कोड़ा.[/caption]
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18 सितंबर 2006 से 27 अगस्त 2008 तक झारखंड के मुख्यमंत्री के तौर गीता के पति मधुकोड़ा थे. इस दरम्यान उन पर भ्रष्टाचार की तमाम तोहमते लगी थी और जेल भी जाना पड़ा था. उन पर कोयला खदानों के आवंटन के एवज में 4000 करोड़ रुपए के रिश्वत लेने के आरोप लगे. जिसके चलते 2017 में तीन साल की सजा और 25 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था. मधुकोड़ा जब मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया, तो काफी मुश्किलों के दौर से गुजर रहे थे. इस दरम्यान उनकी पत्नी गीता कोड़ा ने ही उनकी डूबते राजनीतिक करियर को सहरा दिया और खुद भी सियासत में पांव रखा. 2009 में जय भारत समानता पार्टी से पहली बार विधायक बनीं और 2014 में फिर दोबारा विधायक चुनी गईं.
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इसके बाद गीता ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा और लगातार आगे बढ़ती गई. गीता के सियासी सफर से मधु कोड़ा को फायदा मिला, मुकदमों में उलझे मधु कोड़ा को इससे थोड़ी राहत मिली. हालांकि, अभी भी उन पर केस चल ही रहे हैं. 2014 में देश भर में छाए मोदी लहर में भी गीता को भी हार का सामना करना पड़ा. लेकिन अपनी जबरदस्त छाप मतदाताओं के बीच छोड़ने से पीछे नहीं हटी. भाजपा के दिवगंत नेता लक्ष्मण गिलुवा से उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. वोट प्रतिशत की बात करें, तो गिलुवा को जहां 26 प्रतिशत मत मिले थे, तो गीता ने 18 फीसदी वोट हासिल किया था. हालांकि 2019 लोकसभा चुनाव में गीता कोड़ा ने साबित किया कि कोल्हान में उनका कोई जोर नहीं है. गीता कांग्रेस की टिकट से लड़ते हुए भाजपा के लक्ष्मण गिलुवा को 72 हजार मतो से पटखनी दे ही दी.
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