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राज्यसभा चुनाव से पहले JMM में मंथन तेज, अंजनी सोरेन की दावेदारी ने बढ़ाया सियासी दबाव

Ranchi : झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाले आगामी चुनाव से पहले झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के भीतर अंदरूनी राजनीतिक हलचल तेज हो गई है. 

 

पार्टी के संस्थापक और आदिवासी राजनीति के बड़े चेहरे रहे शिबू सोरेन के निधन के बाद अब संगठन के भीतर यह बहस खुलकर सामने आ गई है कि पार्टी उनकी राजनीतिक विरासत को किस रूप में आगे बढ़ाएगी.

 

पार्टी के एक बड़े वर्ग की मांग है कि शिबू सोरेन की पुत्री अंजनी सोरेन को राज्यसभा भेजा जाए. झामुमो के भीतर इसे केवल भावनात्मक निर्णय के तौर पर नहीं, बल्कि संगठनात्मक मजबूती और राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक संदेश देने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है.

 

कार्यकर्ताओं और नेताओं का मानना है कि संसद के उच्च सदन में सोरेन परिवार की मौजूदगी पार्टी की पहचान को फिर से मजबूती दे सकती है.

 

वर्तमान राजनीतिक समीकरण जेएमएम के पक्ष में माने जा रहे हैं. इंडिया गठबंधन के पास झारखंड विधानसभा में 56 विधायकों का संख्याबल है, जिससे दो राज्यसभा सीटों पर जीत की संभावनाएं मजबूत हैं. इसी वजह से पार्टी के भीतर यह तर्क दिया जा रहा है कि यह मौका सिर्फ सीट भरने का नहीं, बल्कि दूरगामी राजनीतिक संदेश देने का है.

 

क्यों अंजनी सोरेन का नाम सबसे आगे?

पार्टी सूत्रों के अनुसार, अंजनी सोरेन ने ओडिशा में जेएमएम संगठन को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई है. वहां उनकी सक्रियता को संगठन विस्तार के लिहाज से एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है.

 

इससे पार्टी को झारखंड से बाहर अपनी जमीन मजबूत करने का संकेत भी मिलता है. यही वजह है कि जिला और प्रखंड स्तर के कई नेता उनके समर्थन में खुलकर सामने आए हैं. हालांकि अंतिम निर्णय पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को ही लेना है.

 

झामुमो की केंद्रीय समिति में टिकट बंटवारे को लेकर गहन विचार-विमर्श जारी है. नेतृत्व यह भी देख रहा है कि राज्यसभा के जरिए बिहार और ओडिशा जैसे पड़ोसी राज्यों में पार्टी की दीर्घकालिक रणनीति को कैसे साधा जाए.

 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह चुनाव सिर्फ दो सीटों का नहीं, बल्कि झामुमो की भविष्य की दिशा तय करने वाला साबित हो सकता है. अंजनी सोरेन की उम्मीदवारी जहां विरासत और नई पीढ़ी के संतुलन का प्रतीक बन सकती है, वहीं कोई दूसरा फैसला पार्टी के भीतर नई सियासी बहस को जन्म दे सकता है. फिलहाल झारखंड की राजनीति की निगाहें हेमंत सोरेन के अगले कदम पर टिकी हैं.

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