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आइसा ने NEP के 5 वर्ष पूरे होने पर जारी की राष्ट्रीय रिपोर्ट, शिक्षा नीति पर कड़ी आलोचना

Ranchi :  डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय (DSPMU) में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) द्वारा आयोजित छात्र कन्वेंशन में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के पांच वर्ष पूरे होने पर एक राष्ट्रीय रिपोर्ट जारी की गई. इस रिपोर्ट में बीते पांच वर्षों में NEP के प्रभावों की तीखी आलोचना करते हुए इसे भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए खतरनाक बताया गया.

 

रिपोर्ट 12 राज्यों के 20 से अधिक केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों में किए गए फील्डवर्क और साक्ष्यों पर आधारित है. इसके अनुसार, NEP ने जाति और वर्ग आधारित खाई को और गहरा किया है, सकारात्मक कार्रवाई (affirmative action) को कमजोर किया है, तथा विश्वविद्यालयों में मुनाफाखोरी, निगरानी और विचारधारात्मक दबाव को बढ़ावा दिया है.

 

 

शिक्षा का बाज़ारीकरण और मूल्यों का ह्रास

 

डोरंडा कॉलेज के सहायक प्राध्यापक डॉ. फरहान रहमान ने रिपोर्ट का लोकार्पण करते हुए कहा, शिक्षा का उद्देश्य छात्रों में वैज्ञानिक चेतना, आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का विकास करना होना चाहिए, लेकिन वर्तमान शिक्षा नीति इन मूल्यों के विपरीत अंध प्रतिस्पर्धा, डिग्री-केन्द्रित शिक्षा और बाज़ारवादी दृष्टिकोण को बढ़ावा दे रही है.

 

छात्र नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया

इस रिपोर्ट के विमर्श पैनल में आइसा झारखंड की अध्यक्ष विभा पुष्पा दीप, राज्य सचिव त्रिलोकीनाथ, और आदिवासी छात्र संघ के अमृत मुंडा शामिल थे. सभी वक्ताओं ने NEP की प्रतिगामी सोच और शिक्षा-विरोधी उद्देश्यों की कड़ी आलोचना की. उनका कहना था कि यह नीति शिक्षा को अधिकार के बजाय एक सुविधा बनाकर सामाजिक न्याय और समानता के खिलाफ कार्य कर रही है, जिससे आम छात्रों के लिए शिक्षा की पहुंच और अधिक कठिन हो गई है.

 

छात्र नेताओं संजना मेहता, अनुराग राय, विजय कुमार, शालीन कुमार, बादल भोक्ता, गुड्डू भुइंया और जुली उरांव ने ज़मीनी अनुभव साझा किए. उन्होंने चिंता जताई कि NEP के चलते ड्रॉपआउट दर में वृद्धि हो रही है, स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों के लिए बुनियादी ढांचे की कमी है और विचारधारा आधारित कोर्स थोपे जा रहे हैं.

 

FYUP और मल्टीपल एग्ज़िट सिस्टम पर सवाल

 

छात्र नेताओं ने कहा कि NEP का FYUP (चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम) मॉडल और मल्टीपल एग्ज़िट सिस्टम छात्रों को गहन शोध आधारित शिक्षा से हटाकर अस्थिर, कौशल-आधारित मार्गों की ओर धकेल रहा है, जो न तो समग्र विकास की दृष्टि से उपयुक्त है और न ही सामाजिक समावेशन की दृष्टि से.

 

संघर्ष और पुनर्स्थापन का संकल्प

कन्वेंशन में यह सामूहिक संकल्प लिया गया कि विश्वविद्यालयों को समावेशी, लोकतांत्रिक और सभी के लिए सुलभ शैक्षणिक स्थल के रूप में पुनर्स्थापित करने के लिए एक संगठित और व्यापक प्रतिरोध की आवश्यकता है. इसमें छात्र, शिक्षक और समाज के अन्य वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित की जाएगी.

 

 

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