Ranchi : AISA झारखंड ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा जारी उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता का प्रचार (समता संवर्धन) विनियम, 2026 का स्वागत किया है.
इस संबंध में आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आइसा ने कहा कि ये विनियम उच्च शिक्षा संस्थानों में धर्म, नस्ल, लिंग, जन्म-स्थान, जाति और विकलांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं.
आइसा ने स्पष्ट किया कि ये नियम किसी सरकार की कृपा नहीं, बल्कि वर्षों से चले आ रहे छात्र संघर्षों, सामाजिक आंदोलनों और न्यायिक दबावों का परिणाम हैं. संगठन ने कहा कि रोहित वेमुला, पायल तड़वी और दर्शन सोलंकी की संस्थागत हत्याओं ने यह साबित कर दिया था कि 2012 के यूजीसी दिशा-निर्देश पूरी तरह विफल और खोखले थे.
ऐसे में 2026 के विनियमों में ओबीसी समुदाय को समानता और संरक्षण के दायरे में शामिल किया जाना एक आवश्यक और संवैधानिक कदम है, जिसे बहुत पहले लागू किया जाना चाहिए था.
आइसा ने यूजीसी के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 2019 से 2024 के बीच विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
संगठन का आरोप है कि ये घटनाएं संस्थागत स्तर पर मौजूद जातिवादी ढांचे और राज्य की मिलीभगत का परिणाम हैं. इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर्स के दायरे का विस्तार, समता समिति, 24 घंटे की हेल्पलाइन और समता समूह जैसी व्यवस्थाओं को आइसा ने स्वागतयोग्य बताया.
हालांकि, आइसा ने चेतावनी दी कि समता संवर्धन विनियमों के नाम पर राज्य विश्वविद्यालयों को केंद्र सरकार के अधीन करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. संगठन के अनुसार, उच्च शिक्षा का अत्यधिक केंद्रीकरण राज्य के अधिकारों और भारत के संघीय ढांचे पर सीधा हमला है.
आइसा ने समता समिति की संरचना पर भी सवाल उठाए. संगठन का कहना है कि समिति में अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े वर्ग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अस्पष्ट और कमजोर है. साथ ही, सदस्यों के चयन की प्रक्रिया पर भी गंभीर प्रश्न हैं.
आइसा ने आरोप लगाया कि राष्ट्रीय हित के नाम पर आरएसएस-प्रेरित विचारधाराओं को बढ़ावा देना दलित, पिछड़े और आदिवासी छात्रों को न्याय से और दूर कर सकता है.
संगठन ने यह भी कहा कि जब परीक्षा और इंटरव्यू में जाति देखकर अंक देने, पक्षपात करने या योग्य उम्मीदवारों के बावजूद ‘एनएफएस’ (योग्य उम्मीदवार नहीं मिला) घोषित करने जैसी प्रवृत्तियां बढ़ रही हैं, तब ये नियम बहुत देर से आए हैं.
इसके साथ ही आइसा ने मांग की कि समता समिति, इक्विटी सेंटर और अन्य व्यवस्थाओं के नाम पर छात्रों पर कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ न डाला जाए, खासकर तब जब उच्च शिक्षा संस्थानों में हर साल 20 से 30 प्रतिशत तक फीस बढ़ाई जा रही है.
आइसा का स्पष्ट मत है कि जब तक इन विनियमों में वास्तविक प्रतिनिधित्व, संस्थान प्रमुख की भूमिका पर स्पष्ट सीमाएं, सटीक परिभाषाएं और ठोस जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक ये नियम केवल कागजी प्रगतिशीलता बनकर रह जाएंगे.
संगठन ने कहा कि इन सुधारों के लिए उसका संघर्ष आगे भी जारी रहेगा. इसके लिए AISA एक हफ्ते का जागरुकता अभियान हर कॉलेज और विश्वविद्यालय में करेगा. प्रेस कॉन्फ्रेंस को आइसा झारखंड राज्य सचिव त्रिलोकीनाथ, रांची जिला अध्यक्ष विजय कुमार, निखिल राज और स्वेता केवट ने संबोधित किया.
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