Ranchi News : सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्ग की बुनियाद पर खड़ी होने वाली आजसू पार्टी, जो इस विचारधारा को अपनी राजनीतिक पहचान का अहम हिस्सा बताती है, इन दिनों सामाजिक न्याय के स्थान पर 'पारिवारिक न्याय' की परंपरा को निभाने में लगी हुई है.
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हाल के दिनों में पिछड़ा वर्ग से जुड़े नेताओं की पार्टी से दूर होना कई सावलों को जन्म दे रहा है. पार्टी के भीतर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके कई नेता या तो पार्टी छोड़ चुके हैं या फिर लंबे समय से संगठन की सक्रिय गतिविधियों से दूरी बनाए हुए हैं.

रविशंकर मौर्य का इस्तीफा
पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ से जुड़े विजय साहू, विकास राणा, डॉ. बिनय भारत और सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी सुबोध प्रसाद जैसे नेताओं के पार्टी से अलग होने या सक्रिय राजनीति से दूर होने को लेकर सवाल उठ रहे हैं. इन नेताओं को कभी पार्टी के पिछड़ा वर्ग के प्रमुख चेहरों में गिना जाता था. ऐसे में एक के बाद एक नेताओं के संगठन से दूरी बनाने को लेकर पार्टी की सामाजिक न्याय की राजनीति पर बहस शुरू हो गई है.
रवि शंकर मौर्य के इस्तीफे से चर्चा तेज
अब कोल्हान से पार्टी के केंद्रीय महासचिव रहे रवि शंकर मौर्य के इस्तीफे ने इस पूरे घटनाक्रम को और महत्वपूर्ण बना दिया है. मौर्य आजसू पार्टी की पिछड़ा वर्ग महासभा से भी जुड़े रहे हैं. पिछड़े वर्ग के मुद्दों को लेकर वे लंबे समय से सक्रिय रहे हैं और विभिन्न आंदोलनों में अपनी भूमिका निभाते रहे हैं.
मौर्य को पार्टी के प्रमुख पिछड़ा वर्ग चेहरों में माना जाता रहा है. झारखंड के अलावा राज्य के बाहर भी पिछड़ा वर्ग से जुड़े मुद्दों को लेकर उनकी सक्रियता रही है. संगठन के स्तर पर भी उन्हें एक कुशल संगठनकर्ता के रूप में देखा जाता रहा है. ऐसे नेता का पार्टी से इस्तीफा देना संगठन के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है.
शिक्षाविद के रूप में भी रही पहचान
रवि शंकर मौर्य की पहचान केवल राजनीतिक कार्यकर्ता के तौर पर नहीं रही है. वे शिक्षाविद भी हैं. झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों के लिए उन्होंने पुस्तक भी लिखी है. वर्ष 2023 में उन्होंने अजय भगरके के साथ मिलकर ‘संपूर्ण झारखंड’ पुस्तक लिखी थी. यह पुस्तक झारखंड से संबंधित प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए तैयार की गई थी.
मौर्य ने अपने इस्तीफे के पीछे निजी कारणों का हवाला दिया है. उन्होंने सार्वजनिक रूप से पार्टी के खिलाफ कोई बड़ा आरोप नहीं लगाया है. इसके बावजूद उनके इस्तीफे के बाद संगठन के भीतर पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की राजनीति को लेकर चर्चा तेज हो गई है.
सामाजिक न्याय से पारिवारिक न्याय तक बहस
आजसू पार्टी लंबे समय से सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्ग और वंचित तबकों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को राजनीतिक रूप से उठाती रही है. ऐसे में पिछड़ा वर्ग से जुड़े प्रमुख नेताओं के लगातार पार्टी से अलग होने को लेकर राजनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि संगठन में सामाजिक न्याय के मुद्दे को कितनी प्राथमिकता मिल रही है.
पार्टी के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच दबे स्वर में यह चर्चा भी है कि संगठन की राजनीति में सामाजिक न्याय के मुद्दे की जगह कहीं सीमित तो नहीं हो रही. इसी क्रम में कुछ लोग पार्टी पर ‘सामाजिक न्याय’ की जगह ‘पारिवारिक न्याय’ को प्राथमिकता देने का आरोप भी लगा रहे हैं. हालांकि, यह राजनीतिक आरोप और चर्चा है.
केंद्रीय कमेटी में मिली थी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी
आजसू पार्टी ने वर्ष 2023 में अपनी केंद्रीय कमेटी का गठन करते हुए विभिन्न सामाजिक वर्गों और क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने का दावा किया था. उस कमेटी में रवि शंकर मौर्य समेत कई नेताओं को केंद्रीय महासचिव की जिम्मेदारी दी गई थी. पार्टी का कहना था कि संगठन में सभी वर्गों और क्षेत्रों को उचित प्रतिनिधित्व दिया गया है.
अब उसी दौर में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालने वाले नेताओं में से कई के पार्टी से अलग होने या सक्रिय गतिविधियों से दूर होने के बाद संगठन के सामाजिक आधार को लेकर चर्चा शुरू हो गई है. खासकर पिछड़ा वर्ग से जुड़े नेताओं के लगातार अलग होने से यह सवाल उठ रहा है कि आने वाले समय में आजसू पार्टी पिछड़ा वर्ग की राजनीति को किस तरह आगे बढ़ाती है और संगठन में इस वर्ग की भूमिका को किस तरह मजबूत करती है.
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