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रांची विश्वविद्यालय के कुंड़ुख़ विभाग में एलुमनाई मीट का आयोजन

रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा (टीआरएल) संकाय अंतर्गत विश्वविद्यालय कुंड़ुख़ विभाग में पूर्ववर्ती छात्र (एलुमनाई) सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया.
 

Ranchi : रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा (टीआरएल) संकाय अंतर्गत विश्वविद्यालय कुंड़ुख़ विभाग में पूर्ववर्ती छात्र (एलुमनाई) सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया. वर्ष 1980 में विभाग की स्थापना के बाद यह दूसरा अवसर था जब लगभग 200 पूर्व छात्र-छात्राओं का महाजुटान एक ही मंच पर हुआ. यह आयोजन भावनात्मक स्मृतियों, बौद्धिक विमर्श और सामूहिक संकल्प का साक्षी बना.

 

कार्यक्रम की शुरुआत द्वीप प्रज्वलन से हुई. अतिथियों का स्वागत पुष्पगुच्छ, अंगवस्त्र एवं प्रतीक चिन्ह भेंट कर किया गया. कार्यक्रम का संचालन और स्वागत भाषण विभागाध्यक्ष डॉ. बन्दे खलखो ने किया, जबकि धन्यवाद ज्ञापन प्राध्यापक डॉ. हेमन्त टोप्पो ने प्रस्तुत किया.

 

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मुख्य अतिथि प्रो. डॉ. सुरेश कुमार साहु (डीएसडब्ल्यू) ने कहा कि ऐसे आयोजन वर्तमान छात्र-छात्राओं को नई दिशा और प्रेरणा प्रदान करते हैं. उन्होंने कहा कि टीआरएल संकाय झारखंड आंदोलन के दौर में भाषा, संस्कृति और अस्मिता के बौद्धिक मार्गदर्शन का प्रमुख केंद्र रहा है. उन्होंने जोर देते हुए कहा, हमें अपनी एकता बनाए रखनी है और अपनी मातृभाषा को खंडित होने से बचाना है. एकता ही हमारी शक्ति है.

 

अध्यक्षीय संबोधन में टीआरएल के पूर्व विभागाध्यक्ष सह समन्वयक डॉ. हरि उरांव ने कहा कि विश्वविद्यालय कुंड़ुख़ विभाग के पूर्ववर्ती विद्यार्थी आज विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं. यह मिलन उनके योगदान को सम्मानित करने और साझा स्मृतियों को पुनर्जीवित करने का ऐतिहासिक अवसर है. उन्होंने कुंड़ुख़ भाषा और साहित्य के विकास क्रम पर विस्तार से चर्चा की.

 

विशिष्ट अतिथि डॉ. बीरेन्द्र कुमार महतो ने कहा कि यह आयोजन केवल स्मृतियों का उत्सव नहीं, बल्कि सामूहिक अस्मिता का संकल्प है. उन्होंने कहा, भाषा केवल पाठ्यक्रम का विषय नहीं, बल्कि हमारे लोकजीवन, संस्कृति और पहचान की धड़कन है. अलग-अलग विभागों में रहने के बावजूद हमारी चट्टानी एकता बनी रहनी चाहिए.

 

डॉ. किशोर सुरिन ने इसे विभाग की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि यह आयोजन पुराने छात्रों और वर्तमान शिक्षकों के बीच सशक्त सेतु का कार्य करेगा. उन्होंने भावुक शब्दों में कहा, कभी कक्षा की बातें, कभी हंसी के ठहाके, कभी संघर्ष, कभी सपनों के फाके-समय बदला, पर रिश्ते न टूटे. ‘हड़जोड़ा’ में फिर दिल से दिल जुड़े.

 

इस अवसर पर विभागीय पत्रिका हड़जोड़ा तथा डॉ. बीरेन्द्र कुमार महतो की नई पुस्तक सइर फूल का लोकार्पण किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत विभाग के छात्र-छात्राओं द्वारा प्रस्तुत स्वागत गान से हुई.

 

समारोह में विभाग से शिक्षित होकर विभिन्न सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों में कार्यरत पूर्ववर्ती छात्र-छात्राओं ने अपनी स्मृतियां साझा कीं. डॉ. अरुण अमित तिग्गा, डॉ. कीर्ति मिंज, डॉ. बीरेंद्र उरांव, प्रो. धीरज उरांव, डॉ. राधिका कुमारी, डॉ. विकास उरांव, विजय रंजीत एक्का, प्रियंका उरांव, नवल किशोर भगत, प्रो. सोमरा उरांव, दुलारी कुमारी, लक्ष्मण उरांव एवं महावीर उरांव ने संयुक्त रूप से कुंड़ुख़ भाषा के इतिहास, साहित्य और सांस्कृतिक परंपरा पर प्रकाश डाला. साथ ही कुंड़ुख़ भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने हेतु संगठित पहल का आह्वान किया.

 

अंत में उपस्थित छात्रों, शोधार्थियों और शिक्षकों को स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया गया. समारोह में बड़ी संख्या में पूर्ववर्ती एवं वर्तमान छात्र-छात्राएं, शोधार्थी एवं शिक्षक उपस्थित रहे. कार्यक्रम ने स्पष्ट संदेश दिया कि भाषा, संस्कृति और अस्मिता की रक्षा के लिए एकता ही सबसे बड़ी शक्ति है.

 

 

 

 


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