Ranchi: लगातार प्राथमिकी दर्ज कर याचिकादाता (विनय सिंह) को जेल में रखने की कोशिश की गयी. सुप्रीम कोर्ट ने विनय सिंह को जमानत पर रिहा करने का आदेश देते हुए यह टिप्पणी की है. साथ ही 15 साल बाद म्यूटेशन के मामले में प्राथमिकी दर्ज करने को संदिग्द्ध करार दिया है.
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरविंद कुमार और न्यायाधीश प्रसन्ना बी वराले की पीठ में विनय सिंह की याचिका की सुनवाई हुई. विनय सिंह की ओर से रिट याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की गयी थी.
याचिका में सरकार द्वारा मनमाने तरीके से बार-बार प्राथमिकी दर्ज कर जेल में रखने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया था. साथ ही इसे याचिकादाता के मौलिक अधिकारों का हनन बताया गया था.
सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से न्यायालय से यह अनुरोध किया गया कि वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका को नहीं सुने. क्योंकि याचिकादाता के पास जमानत के लिए आवेदन देने का मौका है.
सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका को नहीं सुनने के सरकार के अनुरोध को ठुकरा दिया. न्यायालय ने याचिका की सुनवाई करते हुए डॉक्टर अंबेडकर ने संविधान के अनुच्छे 32 को संविधान की आत्मा कहा था.
यह अनुच्छेद किसी नागरिक को सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रखने का अधिकार देता है. इसलिए न्यायालय इस याचिका को सुनने से इनकार नहीं कर सकती है.
न्यायालय ने सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद कहा कि यह ध्यान देने योग्य बात है कि याचिकाकर्ता को ACB ने प्राथमिकी संख्या 9/25 में पूछताछ के लिए बुलाया.
जांच के दौरान ही उसी दिन हजारीबाग में प्राथमिकी संख्या 11/2025 दर्ज की गयी. इसमें 2010 में दोनों याचिकादाता पर अधिकारियों के साजिश रच कर वनभूमि अपने नाम करने का आरोप लगाया. इसमें सबसे दिलचस्त बात यह है कि म्यूटेशन की घटना 2010 हुई थी.
15 साल तक इसमें कुछ नहीं किया गया. अचानक प्राथमिकी दर्ज कर ली गयी. न्यायालय ने इसके गुणदोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है. लेकिन इसे पूर्वाग्रह से ग्रसित माना है.
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि हाईकोर्ट द्वारा याचिकादाता की जमानत रद्द किये जाने के बाद वह जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था. सुप्रीम कोर्ट ने उसे अंतरिम जमानत दी. जमानत की सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से विरोध में दलीलें दी जा रही थी. लेकिन यह बहुत ही दिलचस्प है कि इस दौरान प्राथमिकी संख्या 20/25 और 458/25 के सिलसिले में कोई बात नहीं की गयी.
कोर्ट ने पूरे मामले पर विचार करने और संबंधित दस्तावेज देखने के बाद यह टिप्पणी की है कि लगातार प्राथमिकी दर्ज कर याचिकादाता को जेल में रखने की कोशिश की जा रही थी. न्यायालय ने याचिकादाता की अपील को स्वीकार करते हुए उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है.
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