- हाईकोर्ट ने सजा समीक्षा बोर्ड का आदेश किया रद्द
- अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश
- अगली बैठक में रखना होगा मामला
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा काट रहे अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई के मामले में राज्य सजा समीक्षा बोर्ड (स्टेट सेंटेंस रिव्यू बोर्ड) के आदेश को निरस्त कर दिया है. हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रंगन मुखोपाध्याय की अदालत ने 13 अक्टूबर 2026 को पारित फैसले में 25 मार्च 2026 की अधिसूचना को याचिकाकर्ता के संबंध में रद्द करते हुए मामले को नए सिरे से विचार के लिए बोर्ड के पास भेज दिया है.
अदालत ने निर्देश दिया है कि अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई के प्रस्ताव को बोर्ड की अगली बैठक में अनिवार्य रूप से रखा जाए. बोर्ड को हाईकोर्ट के फैसले में की गयी टिप्पणियों और सुप्रीम कोर्ट के रोहित चतुर्वेदी मामले में दिये गये निर्देशों के आलोक में विस्तृत और तर्कपूर्ण आदेश पारित करना होगा.
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26 साल वास्तविक और 29 साल रिमिशन के साथ जेल में बिता चुके हैं
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि अनिल शर्मा 26 साल से अधिक वास्तविक कारावास और रिमिशन सहित 29 साल से अधिक की सजा काट चुके हैं. उनके मामले में बिहार सरकार की 24 फरवरी 1984 की समयपूर्व रिहाई नीति लागू होनी चाहिए, क्योंकि उनकी सजा के समय यही नीति प्रभावी थी.
इस नीति के तहत निर्धारित शर्तें पूरी होने पर समयपूर्व रिहाई पर विचार किया जाना चाहिए. याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गयी कि यदि झारखंड सरकार की वर्ष 2007 की नीति लागू मानी जाती है, तब भी वह रिमिशन सहित 25 साल की अवधि पूरी कर चुके हैं. इसलिए उन्हें रिहाई का लाभ मिलना चाहिए.
अदालत को बताया गया कि अनिल शर्मा की उम्र 65 वर्ष से अधिक है और वह कई बीमारियों से पीड़ित हैं. उनकी एम्स में कोरोनरी आर्टरी बाइपास सर्जरी भी हो चुकी है.
जेल में साथी कैदी की हत्या के मामले में मिली थी उम्रकैद
मामले के अनुसार, अनिल शर्मा रांची के लोअर बाजार थाना कांड संख्या 12/1999 में आरोपी थे. उन पर बिरसा मुंडा केंद्रीय कारागार में बंद एक अन्य कैदी सुधीर सिंह उर्फ भोमा पर हमला कर उसकी हत्या करने का आरोप था.मुकदमे की सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने 22 मार्च 2002 को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 और 307/34 के तहत उन्हें दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा सुनायी थी. बाद में झारखंड हाईकोर्ट ने 29 नवंबर 2002 को अपील पर सुनवाई करते हुए दोषसिद्धि बरकरार रखी, लेकिन मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदल दिया. सुप्रीम कोर्ट ने भी 30 अप्रैल 2004 को उनकी अपील खारिज कर दी थी.
पहले भी कई बार खारिज हो चुकी है रिहाई की मांग
अनिल शर्मा की समयपूर्व रिहाई का प्रस्ताव राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के समक्ष कई बार रखा गया था. बोर्ड ने 29 सितंबर 2018 को उनकी रिहाई की मांग खारिज कर दी थी. इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी.
19 अक्टूबर 2022 को हाईकोर्ट ने मामले को दोबारा विचार के लिए बोर्ड के पास भेजा था. अदालत ने राज्य सरकार को संबंधित न्यायिक फैसलों के आलोक में मामले पर विचार करने का निर्देश दिया था. इसके बाद भी बोर्ड ने 22 जून 2023 को रिहाई की मांग खारिज कर दी. इस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका भी 12 दिसंबर 2025 को खारिज हो गयी थी.
बाद में रिहाई का प्रस्ताव फिर बोर्ड के समक्ष रखा गया, लेकिन 25 मार्च 2026 को एक बार फिर उनकी मांग अस्वीकार कर दी गयी. इसी आदेश को अनिल शर्मा ने वर्तमान याचिका में चुनौती दी थी.
सरकार ने जतायी गैंगवार और शांति भंग होने की आशंका
राज्य सरकार की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि अनिल शर्मा एक गैंगस्टर हैं और जेल में साथी कैदी की हत्या के मामले में उन्हें मृत्युदंड दिया गया था, जिसे बाद में उम्रकैद में बदल दिया गया. सरकार के अनुसार, उनकी रिहाई से गैंगवार होने और सार्वजनिक शांति एवं व्यवस्था भंग होने की आशंका है.
सरकार ने यह भी दलील दी कि 14 साल का वास्तविक कारावास और रिमिशन सहित 20 साल की अवधि पूरी कर लेना अपने आप में समयपूर्व रिहाई का अधिकार नहीं देता. रिहाई पर निर्णय लेना राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के विवेकाधिकार में है. सरकार ने यह भी कहा कि बिहार की वर्ष 1984 की नीति के स्थान पर झारखंड सरकार की बाद की नीतियां लागू होंगी.
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने 25 मार्च 2026 की अधिसूचना को अनिल शर्मा के संबंध में रद्द कर दिया और मामले को राज्य सजा समीक्षा बोर्ड के पास वापस भेज दिया. अदालत ने स्पष्ट किया कि उनकी समयपूर्व रिहाई के प्रस्ताव पर बोर्ड की अगली बैठक में विचार किया जाए और सभी प्रासंगिक पहलुओं तथा न्यायालय के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए कारणों सहित नया आदेश पारित किया जाए. हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली .
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