Search

 
 
 

न चंदे की फिक्र, न दिखावे की होड़! देवघर के इस दुर्गा मंदिर में सदियों से ऐसे हो रही मां की आराधना

Deoghar News : यह मंदिर सिर्फ अपनी पूजा व्यवस्था के कारण ही खास नहीं है. इसके साथ जुड़ी पुरानी मान्यताएं, प्रतिमाओं की विशिष्ट स्थिति और अंग्रेजों के शासनकाल से संबंधित एक प्रचलित कथा भी इसे अलग पहचान देती है. स्थानीय लोगों की आस्था में रचा-बसा यह मंदिर आज भी उस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है, जिसमें धार्मिक अनुष्ठान और पारिवारिक जिम्मेदारी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.
 
रोहिणी स्टेट दुर्गा मंदिर
  • रोहिणी स्टेट के मां दुर्गा मंदिर की परंपरा सबसे अलग, अंग्रेजों के दौर से जुड़ी है एक रोचक कथा
  • नवरात्र में दर्जनों गांवों के श्रद्धालु लगाते हैं हाजिरी

Deoghar News : नवरात्र आते ही शहर से लेकर गांवों तक मां दुर्गा की आराधना शुरू हो जाती है. कहीं भव्य पूजा पंडाल सजते हैं, कहीं आकर्षक विद्युत सज्जा होती है, तो कहीं पूजा के आयोजन के लिए चंदा जुटाया जाता है. लेकिन देवघर के रोहिणी स्टेट स्थित मां दुर्गा मंदिर की परंपरा इन सबसे अलग है. यहां न सार्वजनिक चंदा जुटाने की होड़ है और न ही पूजा की भव्यता दिखाने की प्रतिस्पर्धा. यहां वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, स्टेट परिवार ही मां की पूजा का पूरा खर्च वहन करता है.

 

इसे भी पढ़ें...

 

यह मंदिर सिर्फ अपनी पूजा व्यवस्था के कारण ही खास नहीं है. इसके साथ जुड़ी पुरानी मान्यताएं, प्रतिमाओं की विशिष्ट स्थिति और अंग्रेजों के शासनकाल से संबंधित एक प्रचलित कथा भी इसे अलग पहचान देती है. स्थानीय लोगों की आस्था में रचा-बसा यह मंदिर आज भी उस परंपरा को आगे बढ़ा रहा है, जिसमें धार्मिक अनुष्ठान और पारिवारिक जिम्मेदारी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.

 

जब पूजा के लिए चंदा नहीं, परिवार उठाता है पूरी जिम्मेदारी

आज दुर्गा पूजा कई जगह सामूहिक आयोजन का रूप ले चुकी है. आयोजन समितियां चंदा जुटाती हैं और श्रद्धालुओं के सहयोग से पूजा संपन्न कराती हैं. लेकिन रोहिणी स्टेट के इस मंदिर में व्यवस्था अलग है. यहां मां दुर्गा की पूजा का आयोजन स्टेट परिवार की ओर से कराया जाता है.

 

मंदिर की व्यवस्था संभाल रहे संजीव कुमार देव और चिरंजीव कुमार देव इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. परिवार की ओर से पूजा का प्रबंध किए जाने के कारण आयोजन के लिए सार्वजनिक चंदे पर निर्भरता नहीं है.

 

इस व्यवस्था की खासियत केवल आर्थिक नहीं, बल्कि परंपरा के प्रति निरंतरता भी है. वर्षों से चली आ रही पूजा-पद्धति को बनाए रखना और धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार आयोजन करना इस मंदिर की पहचान बन चुका है.

 

1700 ईस्वी से पहले की बताई जाती है मंदिर की स्थापना

रोहिणी स्टेट स्थित मां दुर्गा मंदिर की स्थापना 1700 ईस्वी से पहले होने की मान्यता है. मंदिर के पुजारी जागेश्वर पांडेय के अनुसार, यहां लंबे समय से मां दुर्गा की पूजा होती आ रही है.

 

पुजारी का कहना है कि वर्ष 1868 में महान संत रामकृष्ण परमहंस भी इस मंदिर में दर्शन के लिए आए थे. यदि इस ऐतिहासिक संदर्भ की पुष्टि दस्तावेजों से होती है, तो यह मंदिर के इतिहास का एक महत्वपूर्ण पहलू है.

 

मंदिर की प्राचीनता से जुड़ी मान्यताएं इसे केवल स्थानीय पूजा स्थल तक सीमित नहीं रखतीं, बल्कि देवघर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के एक हिस्से के रूप में भी इसकी पहचान बनाती हैं.

 

अंग्रेजों के शासनकाल से जुड़ी वह कथा, जो आज भी सुनाई जाती है

इस मंदिर से जुड़ी सबसे चर्चित कहानी अंग्रेजों के शासनकाल की है. मंदिर के पुजारी जागेश्वर पांडेय के अनुसार, रोहिणी के निकट गौराडीह इलाके में अंग्रेज अधिकारियों का शिविर हुआ करता था. यह शिविर मंदिर से लगभग 200 मीटर की दूरी पर बताया जाता है.

 

उस समय मंदिर में मिट्टी की प्रतिमाएं स्थापित कर मां दुर्गा की पूजा की जाती थी. पुजारी के मुताबिक, अंग्रेज अधिकारियों ने इस पूजा पर आपत्ति जताई और तत्कालीन पुजारी चक्रधर चक्रवर्ती को पूजा बंद करने का फरमान सुनाया.

 

लेकिन प्रचलित कथा के अनुसार, पुजारी ने मां की आराधना जारी रखी. इसके बाद मंदिर का पट खोला गया, तो भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय की प्रतिमाओं की स्थिति बदली हुई दिखाई देने की बात कही जाती है. कथा में यह भी बताया जाता है कि इस दृश्य को देखकर अंग्रेज अधिकारी हैरान रह गए थे.

 

यह घटना मंदिर की धार्मिक मान्यताओं और स्थानीय जनश्रुतियों का हिस्सा है. इसकी ऐतिहासिक पुष्टि के लिए स्वतंत्र दस्तावेजों की आवश्यकता है, लेकिन मंदिर से जुड़ी यह कहानी आज भी श्रद्धालुओं के बीच सुनाई जाती है.

 

Lagatar Media की यह खबर आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें.

Comments
Leave a Comment
Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही