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जमशेदपुर के होटल साहू का नीलामी मामला: हाईकोर्ट ने BSFC की 83.14 लाख की मांग रद्द की

Ranchi News: मामले के अनुसार, होटल साहू नामक साझेदारी फर्म ने बिहार राज्य वित्तीय निगम से ऋण लिया था. ऋण का भुगतान नहीं होने पर निगम ने बंधक संपत्ति की नीलामी की. वर्ष 2008 में बिमला डे के पति बिश्वनाथ चंद्र डे की 91 लाख रुपये की बोली को सबसे अधिक स्वीकार्य बोली के रूप में मंजूरी दी गई थी. उनके पति ने बिक्री मूल्य का 25 प्रतिशत यानी 22.75 लाख रुपये जमा भी कर दिया था.
 
फाइल फोटो
  • तीन सप्ताह के भीतर नीलामी में खरीदी गई संपत्ति का कब्जा सौंपने का आदेश
  • कोर्ट ने कहा- अपनी गलती का फायदा नहीं उठा सकता निगम

Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने जमशेदपुर स्थित होटल साहू की नीलामी से जुड़े मामले में फैसला सुनाते हुए बिहार राज्य वित्तीय निगम (बीएसएफसी) की ओर से की गई 83 लाख 14 हजार 484 रुपये की मांग को रद्द कर दिया है. अदालत ने निगम को निर्देश दिया है कि वह नीलामी में खरीदी गई संपत्ति का कब्जा याचिकाकर्ता बिमला डे को तीन सप्ताह के भीतर सौंपे. अदालत ने स्पष्ट किया कि जब नीलामी की शर्तों को पूरा करने के लिए खरीदार तैयार था, तब निगम अपनी ओर से समझौते का पालन नहीं करने के कारण खरीदार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं डाल सकता.

 

हाईकोर्ट ने बीएसएफसी के 11 सितंबर 2019 के उस पत्र को निरस्त कर दिया, जिसके माध्यम से याचिकाकर्ता से 83,14,484 रुपये की मांग की गई थी. बीएसएफसी की ओर से अधिवक्ता अशोक कुमार यादव ने पक्ष रखा.

 

2008 में 91 लाख रुपये में हुई थी नीलामी

मामले के अनुसार, होटल साहू नामक साझेदारी फर्म ने बिहार राज्य वित्तीय निगम से ऋण लिया था. ऋण का भुगतान नहीं होने पर निगम ने बंधक संपत्ति की नीलामी की. वर्ष 2008 में बिमला डे के पति बिश्वनाथ चंद्र डे की 91 लाख रुपये की बोली को सबसे अधिक स्वीकार्य बोली के रूप में मंजूरी दी गई थी. उनके पति ने बिक्री मूल्य का 25 प्रतिशत यानी 22.75 लाख रुपये जमा भी कर दिया था.


हालांकि होटल साहू की ओर से नीलामी प्रक्रिया को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी गई. पटना हाईकोर्ट ने 26 नवंबर 2015 को चुनौती खारिज करते हुए बीएसएफसी को बिश्वनाथ चंद्र डे के पक्ष में बिक्री की प्रक्रिया पूरी करने की अनुमति दे दी.


इसके बाद बीएसएफसी ने 29 अगस्त 2016 को नीलामी संबंधी पूर्व आदेश को पुनर्वैध किया. निगम ने शेष बिक्री मूल्य की 25 प्रतिशत राशि के रूप में 17.06 लाख रुपये जमा करने की शर्त रखी. याचिकाकर्ता के पति ने यह राशि भी बैंक ड्राफ्ट के माध्यम से जमा कर दी. इसके बाद 28 अक्टूबर 2016 को निगम के साथ बिक्री सह शेष ऋण भुगतान संबंधी समझौता किया गया.

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प्रशासन की पहल के बावजूद नहीं मिला कब्जा

नीलामी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी संपत्ति का कब्जा नहीं सौंपा गया. कब्जा दिलाने के लिए जमशेदपुर के अनुमंडल पदाधिकारी ने 26 दिसंबर 2016 को मजिस्ट्रेट और सशस्त्र बल की प्रतिनियुक्ति का आदेश दिया था. इसके बावजूद 29 दिसंबर 2016 को बीएसएफसी के अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचे. बाद में 16 फरवरी 2017 को अधिकारी देर से पहुंचे, जिसके कारण कब्जा दिलाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी.


इस संबंध में धालभूमगढ़ के अनुमंडल पदाधिकारी ने 15 मई 2017 को पत्र जारी कर निगम के अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठाए थे. अदालत ने भी इस मामले में पूर्व में पारित आदेश में निगम के अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर टिप्पणी की थी.

 

निगम की दलील अदालत ने नहीं मानी

बीएसएफसी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि संपत्ति की नीलामी 'जहां जैसी है, जिस स्थिति में है' के आधार पर की गई थी. निगम का कहना था कि कब्जा दिलाने के लिए जिला प्रशासन से सहयोग मांगा गया था, लेकिन मजिस्ट्रेट और पुलिस बल की अनुपलब्धता और मौके पर विरोध के कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी. निगम ने संपत्ति के मूल्य में वृद्धि का हवाला देते हुए अतिरिक्त राशि की मांग को उचित ठहराने का प्रयास भी किया.
वहीं याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उनके पति ने नीलामी की शर्तों के अनुसार आवश्यक राशि जमा कर दी थी और सभी कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर ली थीं. इसके बावजूद निगम वर्षों तक संपत्ति का कब्जा नहीं दिला सका. ऐसे में अतिरिक्त राशि की मांग अनुचित और मनमानी है.

 

अपनी गलती का लाभ नहीं उठा सकता कोई पक्ष

दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि बीएसएफसी ने समझौते के तहत अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन नहीं किया. निगम की ओर से कब्जा दिलाने में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, जबकि खरीदार समझौते की शर्तों का पालन करने के लिए तैयार था.


अदालत ने कहा कि कोई भी पक्ष अपनी गलती या निष्क्रियता का फायदा उठाकर दूसरे पक्ष को नुकसान नहीं पहुंचा सकता. अदालत ने यह भी कहा कि केवल इस आधार पर कि संपत्ति की कीमत बढ़ गई है, पहले से स्वीकृत नीलामी के संबंध में खरीदार से मनमाने ढंग से अतिरिक्त राशि की मांग उचित नहीं है.

 

14 अक्टूबर 2026 से लागू होंगी समझौते की समय-सीमाएं

हाईकोर्ट ने बीएसएफसी की ओर से 11 सितंबर 2019 को जारी 83,14,484 रुपये की मांग संबंधी पत्र को निरस्त करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को तीन सप्ताह के भीतर संपत्ति का कब्जा सौंपा जाए.

 

अदालत ने स्पष्ट किया कि बीएसएफसी और याचिकाकर्ता के बीच 28 अक्टूबर 2016 को हुए बिक्री सह शेष ऋण भुगतान समझौते की शर्तें लागू रहेंगी और दोनों पक्षों को उनका सख्ती से पालन करना होगा. समझौते में निर्धारित समय-सीमा की गणना 14 अक्टूबर 2026 से की जाएगी.
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अब से संपत्ति में रहने वाले किरायेदार याचिकाकर्ता के किरायेदार माने जाएंगे और उन्हें किराया याचिकाकर्ता को देना होगा. मकान मालिक के रूप में याचिकाकर्ता को किरायेदारों के संबंध में आवश्यक कार्रवाई करने की स्वतंत्रता होगी.

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