दो अक्टूबर को दिल्ली पुलिस में जो हुआ, वह पहले कभी नहीं हुआ. दिल्ली पुलिस मुख्यालय के सामने पुलिसकर्मियों ने प्रदर्शन कर डाला. ये वही पुलिसकर्मी हैं, जो बाकी लोगों को प्रदर्शन करने से रोकते दिखते हैं. दौड़ा-दौड़ा कर पकड़ते हैं. गिरफ्तार करके ले जाते दिखते हैं. आखिर ऐसा क्या हुआ कि करीब 100 से अधिक जवान प्रदर्शन करने लगे?
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दरअसल, दिल्ली पुलिस के अधिकारियों पर राजनीतिक दवाब अब तक के सबसे चरम स्थिति पर पहुंच चुकी है. सत्ता के सामने जब भी कोई परेशानी आती है, वह पुलिस को आगे कर देती है. पुलिस उनसे निपटती है. लेकिन तभी कोई और समूह उस पर हावी हो जाता है. अब फिर सत्ता परेशान हो जाती है और पुलिस को झुकना पड़ता है.
दिल्ली में यही हुआ है हाल के दिनों में. 23 अक्टूबर को शाहदरा पुलिस थाना में पुलिसकर्मियों और वकीलों के बीच झड़प हुई. इसमें एक वकील ललित वस्ल के सिर में गंभीर चोट लगी. इसके बाद जिला अदालतों के वकीलों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल कर दिया. 28 अक्टूबर को केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर एसीपी मनस्वी वशिष्ठ और शाहदरा के प्रभारी इंस्पेक्टर अरुण कुमार का तबादला कर दिया गया. फिर वकीलों की हड़ताल खत्म हो गई.
अब दो नवंबर को पुलिस के पदाधिकारियों व जवानों ने मोर्चा खोल दिया. वो पहुंच गए पुलिस मुख्यालय के बाहर और प्रदर्शन करने लगे. पुलिसकर्मियों की मांग थी कि एसीपी मनस्वी वशिष्ठ व प्रभारी अरुण कुमार को पुरानी पोस्टिंग दी जाये. वकीलों पर दर्ज मुकदमे वापस न किए जाए. थानों में वकीलों के प्रवेश व व्यवहार के लिए एसोओपी बने. पांच से अधिक वकीलों को भीड़ माना जाये. अदालतों व थानों में सुरक्षा बढ़ायी जाये. बार एसोसिएशन के साथ सामंजस्य बैठाया जाये.
ऊपर से देखने पर तो यह मांग जायज लगती है. लेकिन इसके पीछे का सच कुछ और ही है. दरअसल, राजनीतिक दखलअंदाजी ने हमारी पुलिस फोर्स को ना सिर्फ भ्रष्ट बना दिया है, बल्कि काम के प्रति बेईमानी करना भी सिखा दिया है. राजनीतिक आकाओं के इशारों पर किसी को फंसाने, किसी को पकड़ने, किसी को छोड़ने, किसी का एनकाउंटर करने, किसी के पक्ष में काम करने, वाजिब कारणों से शांति पूर्वक आंदोलन करने वालों को पीटने वाला फोर्स बना दिया है. अब यही फोर्स बेकाबू होने लगा है या यूं कहें कि वह समझने लगे हैं कि यह सब बंद होना चाहिए. वही करना चाहिए, जो कानून के दायरे में आता है. और जो इस देश का संविधान व कानून करने की इजाजत देता है.
बहरहाल, पदाधिकारियों और जवानों के प्रदर्शन के बाद गृह मंत्रालय ने एसीपी मनस्वी वशिष्ठ को सस्पेंड कर दिया है. लेकिन यह जो आग लग चुकी है, क्या उस पर तुरंत काबू पा लिया जायेगा. अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह आग देश के दूसरे राज्यों तक भी फैलेगी और शायद तब पुलिस राजनीतिक सत्ता के दवाब से बाहर निकल आयेगी.

