Ranchi : दो जून 2015 का वह दिन. हजारीबाग सिविल कोर्ट परिसर. चहल-पहल के साथ जहां-तहां खड़े सैंकड़ों लोगों की भीड़. वर्दी में पुलिस की तैनाती. इन सबके बीच सरेआम गैंगस्टर सुशील श्रीवास्तव समेत तीन लोगों की हत्या कर दी गई थी.
इस मामले में आज झारखंड हाईकोर्ट का फैसला आया. जिन पांच अपराधियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया, जिन्हें निचली अदालत ने दोषी मानते हुए सजा दी, वे हाईकोर्ट से बरी हो गए.
ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर सुशील श्रीवास्तव की हत्या किसने की? किन लोगों ने हत्या की योजना बनायी? शूटर कौन थे?
हाईकोर्ट के फैसले के साथ यह सवाल सामने है कि आखिर पुलिस ने कैसे जांच की? आखिर चूक कहां रह गई? हाईकोर्ट के आदेश की विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद ही इस बारे में पता चल पाएगा. लेकिन क्या कभी कोई जान भी पायेगा कि हत्या किसने करायी? किसने की? क्यों की? शायद नहीं.
सुशील श्रीवास्तव की हत्या की घटना पुलिस के लिए ऐतिहासिक रूप से शर्मनाक थी. क्योंकि हत्या पुलिस की सुरक्षा में की गई थी. पुलिस वाले भी निशाना बने थे. इन सबके बाद भी पुलिस ने मामले में सही तरीके से जांच नहीं की. सबूत और साक्ष्य नहीं जुटा पायी. तभी तो सभी आरोपी हाईकोर्ट से बरी हो गए.
जो बरी हुए, उनके नाम विकास तिवारी, संतोष पांडे, विशाल कुमार सिंह, राहुल देव पांडे और दिलीप साव है. सभी भोला पांडेय गिरोह के अपराधी हैं. विकास तिवारी तो अब इस गिरोह का हेड है.
भोला पांडेय गिरोह और सुशील श्रीवास्तव गिरोह के बीच की अदावत कोई नई नहीं थी ना नया है. इसके बाद भी पुलिस सबूत नहीं जुटा पायी. अनुसंधान में चूक कर दी. या जानबूझ कर असली हत्यारे को बचा लिया गया और इन पांचों को फंसा दिया गया था?
दरअसल, सुशील श्रीवास्तव हत्याकांड में हजारीबाग पुलिस पर बड़ा सवाल उठा था. इसकी एक बड़ी वजह थी. आमतौर पर जब सुशील श्रीवास्तव को पेशी के लिए अदालत में ले जाया जाता था, तब पुलिस के अलावा उसके लोग भी कोर्ट कैंपस में मौजूद रहते थे.
लेकिन हत्या के दिन यह नहीं हो सका था. पुलिस ने किसी को भी कोर्ट कैंपस में घुसने नहीं दिया था. यहां तक कि उनके परिवार के सदस्यों तक को गेट के बाहर ही रोक दिया गया था.
इसके कुछ ही मिनटों के बाद गोलियों की आवाज सबने सुनी. सैंकड़ों लोगों ने अपराधियों को गोलियां चलाते देखा. दिवाल फांदकर भागते हुए देखा. लेकिन अब पता चल रहा है कि जिन्हें पकड़ा गया, वो हत्यारे नहीं.
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