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बिहार : बच्चों के स्क्रीन टाइम पर लगेगी लगाम, सरकार जल्द लाएगी नई डिजिटल पॉलिसी

डिजिटल युग में मोबाइल का बढ़ता इस्तेमाल अब एक नई चुनौती बन गई है. खासकर बच्चों और किशोरों में रील्स देखने, ऑनलाइन गेम खेलने और लगातार सोशल मीडिया स्क्रॉल करने की आदत तेजी से बढ़ रही है.
 
  • बच्चों में मोबाइल फोन के बढ़ते इस्तेमाल का मुद्दा उठाया

Lagatar Desk :  बिहार सरकार बच्चों के स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करने के लिए जल्द नई डिजिटल पॉलिसी लाएगी. इसकी घोषणा सोमवार को बिहार विधानसभा में इस पर चर्चा के बाद की गई.  दरअसल पश्चिम चंपारण के सिकटा क्षेत्र से जदयू विधायक समृद्ध वर्मा ने सदन में यह मुद्दा उठाया.

 

उन्होंने बच्चों में बढ़ती स्क्रीन लत को “अदृश्य महामारी” बताया. कहा कि स्मार्टफोन अब गांवों तक पहुंच चुका है और बच्चे घंटों यूट्यूब, सोशल मीडिया और ऑनलाइन गेम्स में व्यस्त रहते हैं. इसका असर उनकी पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. 

 

जदयू विधायक ने कहा कि लगातार रील्स देखने से डोपामाइन का प्रभाव बढ़ता है, जिससे बच्चों की एकाग्रता कम होती है और वास्तविक जीवन की गतिविधियां उन्हें कम आकर्षक लगने लगती हैं.  उन्होंने मांग की कि अलग-अलग आयु वर्ग के अनुसार स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा तय की जाए.

 

साथ ही इसे राष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट घोषित करने का आग्रह किया. वर्मा ने कहा कि यह केवल टेक्नोलॉजी का सवाल नहीं, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर विषय है, जिसके लिए आईटी, शिक्षा और स्वास्थ्य विभागों के संयुक्त प्रयास की जरूरत है.

 

सरकार स्क्रीन टाइम को लेकर जल्द जारी करेगी गाइडलाइन 

राज्य की आईटी मंत्री श्रेयसी सिंह ने जवाब में कहा कि बच्चों में बढ़ती डिजिटल निर्भरता चिंता का विषय है. बताया कि केंद्र सरकार ने इसको लेकर दिशा-निर्देश जारी किए हैं. राज्य सरकार भी बहु-विभागीय रणनीति के तहत ठोस नीति तैयार करेगी.

 

श्रेयसी सिंह ने बताया कि बेंगलुरु स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज (निमहांस) से इस पर सलाह मांगी गई है. रिपोर्ट मिलने के बाद मानक तय किए जाएंगे और उसी आधार पर विस्तृत गाइडलाइन जारी की जाएगी. 

 

टेक्नोलॉजी का सुरक्षित व संतुलित इस्तेमाल जरूरी : सम्राट चौधरी

इस पर डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने कहा कि सरकार बच्चों के हित में संतुलित डिजिटल नीति पर काम कर रही है. कहा कि तकनीक से दूरी समाधान नहीं है, बल्कि उसका सुरक्षित और संतुलित उपयोग सुनिश्चित करना जरूरी है, ताकि बच्चे डिजिटल माध्यम से सीखते हुए सुरक्षित भी रह सकें. 

 

 

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