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Bihar University News: बिहार के 11 यूनिवर्सिटी में 604 करोड़ का हिसाब गायब!

बिहार के विश्वविद्यालयों से वित्तीय गड़बड़ी को लेकर एक बड़ा खुलासा सामने आया है, जिसने पूरे शिक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं. राज्य के 11 प्रमुख विश्वविद्यालयों पर 604.20 करोड़ रुपये की उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) लंबित है.
 

Patna: बिहार के विश्वविद्यालयों से वित्तीय गड़बड़ी को लेकर एक बड़ा खुलासा सामने आया है, जिसने पूरे शिक्षा तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं. राज्य के 11 प्रमुख विश्वविद्यालयों पर 604.20 करोड़ रुपये की उपयोगिता प्रमाण पत्र (यूसी) लंबित है. सरकार से मिले फंड का पूरा हिसाब अब तक नहीं दिया गया है. लोकभवन ने कड़ा रुख अपनाते हुए सभी संबंधित विश्वविद्यालयों को जल्द जवाब देने और लंबित यूसी जमा करने का निर्देश दिया है.

 

राज्यपाल की बैठक में खुली लापरवाही

मामला उस समय सामने आया, जब 30 मार्च को कुलाधिपति की अध्यक्षता में विश्वविद्यालयों की एक अहम समीक्षा बैठक हुई. बैठक में शैक्षणिक और गैर-शैक्षणिक गतिविधियों के साथ-साथ वित्तीय स्थिति की भी समीक्षा की गई. जिसमें पता चला कि कई विश्वविद्यालय वर्षों से करोड़ों रुपये का उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा नहीं कर पाए हैं.

 

जानकारों का कहना है कि यूसी किसी भी सरकारी फंड के उपयोग का सबसे अहम फाइल होता है. इसके बिना यह स्पष्ट नहीं होता कि पैसा किस काम में खर्च हुआ और उसका सही उपयोग हुआ या नहीं. ऐसे में इतनी बड़ी राशि के यूसी लंबित होना बेहद गंभीर माना जा रहा है.

 

दरभंगा संस्कृत विवि पर सबसे ज्यादा

इस मामले में सबसे खराब स्थिति कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय की सामने आई है. विश्वविद्यालय पर अकेले 237.83 करोड़ रुपये का यूसी बकाया है. इससे साफ होता है कि लंबे समय से यहां वित्तीय रिपोर्टिंग में लापरवाही बरती गई है.

 

मुंगेर विवि पर 105 करोड़ का UC लंबित

मुंगेर विश्वविद्यालय दूसरे नंबर पर है, जहां वित्तीय वर्ष 2019-20 से लेकर 2024-25 तक का 105.92 करोड़ रुपये का उपयोगिता प्रमाण पत्र बकाया है. लोकभवन ने इस पर कड़ी नाराजगी जताई है और विश्वविद्यालय प्रशासन को निर्देश दिया है कि जल्द से जल्द सभी दस्तावेज प्रस्तुत करे

 

लोकभवन का सख्त रुख

लोकभवन ने साफ संकेत दिया है कि इस मामले को हल्के में नहीं लिया जाएगा. जिन विश्वविद्यालयों ने समय पर यूसी जमा नहीं किया है, उनके खिलाफ कार्रवाई भी की जा सकती है. जानकारों का कहना है कि यह मामला सिर्फ कागजी गड़बड़ी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा हुआ है.

पूरे मामले ने बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. करोड़ों रुपये का हिसाब लंबित होना सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि निगरानी तंत्र की कमजोरी को भी बताता है.

 

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