NewDelhi : कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भाजपा लोकसभा में 2/3 बहुमत चाहती है, क्योंकि उसका असली मकसद आरक्षण को खत्म करना है. कांग्रेस ने आज बुधवार को आरोप लगाया कि भाजपा लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने की कोशिश में लगी हुई है, क्योंकि उसका असली और अंतिम मकसद संविधान में संशोधन कर आरक्षण को खत्म करना है.
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने PTI वीडियो को दिये एक इंटरव्यू में यह दावा किया. उन्होंने आरोप लगाया कि सत्ताधारी पार्टी(भाजपा) पहले महिला आरक्षण की आड़ में परिसीमन (डिलिमिटेशन) को आगे बढ़ाना चाहती है, ताकि अंततः आरक्षण को पूरी तरह खत्म किया जा सके.
जयराम रमेश ने कहा कि अगर सरकार सच में महिलाओं के आरक्षण को लेकर चिंतित है, तो उसे लोकसभा की मौजूदा संख्या के आधार पर इसे लागू करना चाहिए.
अपने इंटरव्यू में कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने विभिन्न मुद्दों पर बातें रखी. उन्होंने पूछे जाने पर कहा कि जो युवा नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में गये हैं, उन्हें कभी भी पार्टी में वापस नहीं लिया जाना चाहिए.
जयराम रमेश ने कहा कि उनके वापस आने के बारे में सोचना भी हमारे लिए शर्मनाक होगा. हालांकि, कांग्रेस नेता ने यह भी साफ़ किया कि यह उनकी निजी राय है.
जयराम रमेश ने सोनिया गांधी के साथ मिलकर काम करने के अपने अनुभव के बारे में कहा, 2004 में किसी को उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस जीतेगी. कहा कि यह इंडिया शाइनिंग का दौर था, अटल बिहारी वाजपेयी बहुत बड़े और करिश्माई नेता थे, लेकिन हमने एक चमत्कार कर दिखाया. हम सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे, हमें 145 सीटें मिलीं.
उसके बाद UPA बना. इसके बाद 10 सालों तक डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने रहे. सोनिया गांधी अप्रैल 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष बनीं. उन्होंने पार्टी को एकजुट रखा.जयराम रमेश ने कहा कि एक समय ऐसा था जब 15 राज्यों में कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे. उनके सम्मेलन होते थे, पहला सम्मेलन गुवाहाटी में हुआ, फिर श्रीनगर में और दिल्ली में हुआं.
जयराम रमेश ने कहा कि इन सम्मेलनों में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) और वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Act) जैसे विचार सामने आये. सभी विचार इन मुख्यमंत्रियों के साथ उनकी बातचीत से निकले. जयराम रमेश ने कहा कि इस तरह उन्होंने कई मायनों में पार्टी को बचाया.
रमेश ने कहा कि 1998 से 2004 तक हम मुख्य विपक्षी पार्टी रहे. 1999 से 2004 तक वह(सोनिया गांधी) खुद विपक्ष की नेता थीं. उन्होंने किसी और से कहीं ज़्यादा विपक्षी पार्टियों को एकजुट किया, यह 16 मई 2004 की शाम UPA के रूप में सामने आया.
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