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भवन निर्माण निगम की 102 करोड़ की योजनाएं अधूरी, किसानों को धान का पैसा देने में दो साल हुई देरी

Ranchi: भवन निर्माण निगम द्वारा शुरू की गयी 45 प्रतिशत योजनाएं अधूरी हैं. जमीन उपलब्ध नहीं होने की वजह से 112 कार्यों को या तो रद्द कर दिया गया या बंद कर दिया गया. निगम में ठेकेदारों को अधिक भुगतान सहित अन्य प्रकार की अनियमितताएं पायी गयीं. राज्य सरकार धान खरीद के लिए निर्धारित लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकी. किसानों को धान का पैसा देने में दो साल तक की देर हुई. धान के बदले चावल नहीं देने वाले 33 मिलरों से 71.81 करोड़ की वसूली नहीं हुई.
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Ranchi: भवन निर्माण निगम द्वारा शुरू की गयी 45 प्रतिशत योजनाएं अधूरी हैं. जमीन उपलब्ध नहीं होने की वजह से 112 कार्यों को या तो रद्द कर दिया गया या बंद कर दिया गया. निगम में ठेकेदारों को अधिक भुगतान सहित अन्य प्रकार की अनियमितताएं पायी गयीं. राज्य सरकार धान खरीद के लिए निर्धारित लक्ष्य को पूरा नहीं कर सकी. किसानों को धान का पैसा देने में दो साल तक की देर हुई. धान के बदले चावल नहीं देने वाले 33 मिलरों से 71.81 करोड़ की वसूली नहीं हुई. विधानसभा में पेश CAG की रिपोर्ट में इन तथ्यों का उल्लेख किया गया है.


विधानसभा में CAG की दो रिपोर्ट पेश हुई. CAG की एक रिपोर्ट राज्य के सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों और दूसरी रिपोर्ट स्थानीय निकायों से संबंधित है. सार्वजनिक उद्यमों से संबंधित रिपोर्ट में भवन निर्माण निगम,राज्य नागरिक खाद्य आपूर्ति निगम और राज्य बिजली वितरण निगम के कार्यों और उसमें हुई अमियमितताओं का उल्लेख किया गया है.


भवन निर्माण से संबंधित रिपोर्ट में कहा गया है कि निगम ने 24 निर्माण कार्यों का 60.95 करोड़ रुपये संबंधित विभागों को वापस करने के बदले चार से सात साल तक व्यक्तिगत लेजर खाते में रखा था. ऑडिट के दौरान पाया गया कि निगम ने ना तो कॉरपोरेट बजट तैयार किया था और ना ही विस्तृत डीपीआर.

 
निगम ने शुरू किये गये कार्यों की निगरानी के लिए कोई तकनीकी समिति नहीं गठित की. वास्तविक स्थल का और परिस्थितियों का आकलन किये बिना ही सलाहकारों द्वारा तैयार किये गये मॉडल अनुमान के आधार पर परियोजनाओं को शुरू किया. कुछ विभाग ने निगम को सौंपे गये निर्माण कार्यों के लिए जमीन नहीं उपलब्ध नहीं करायी. इससे 102.87 करोड़ रुपये लागत की 35 योजनाएं अधूरी रह गयीं.  

 

निगम द्वारा हाईटेंशन ट्रांसमिशन लाईन के प्रभावों का आकलन किये बिना 12 करोड़ की लागत से बनाये गये डिग्री कॉलेज का इस्तेमाल नहीं हो रहा है. डांडा और बिशुनपुरा में बालिका आवासीय विद्यालय का आंशिक निर्माण किया गया. इससे इसपर किया गया 5.60 करोड़ रुपये का खर्च बेकार साबित हुआ. संगमा में ठेकेदार द्वारा बालिका आवासीय विद्यालय का काम रोक देने से 2.80 करोड़ रुपये का खर्च बेकार हुआ.

 

ऑडिट के दौरान 206 कार्यों की जांच की गयी. इसमें कई तरह की अनियमितताएं पायी गयीं. इसमें पारदर्शिता की कमी, एकरारनामा करने में देर, अनियमित भुगतान, पूरक एकरारनामा में गड़बड़ी शामिल है. ऑडिट के दौरान पाया गया कि भवन निर्माण निगम ने वर्ष 2015-2023 के बीच 1328 योजनाओँ का काम शुरू किया था. इन योजनाओं की कुल लागत 14020.46 करोड़ रुपये थी. निगम ने इसमें से सिर्फ 55 प्रतिशत योजनाओं को ही पूरी किया. निगम द्वारा पूरी की गयी इन 725 योजनाओं की लागत 4291.07 करोड़ रुपये था. 

 

ऑडिट में पाया गया कि निगम द्वारा शुरू की गयी योजनाओं में से 272 का काम प्रारंभिक चरण में 218 में प्रगति थी. ऑडिट में पाया गया कि 112 योजनाओं के लिए जमीन उपलब्ध नहीं होने की वजह से इन योजनाओं को या तो रद्द कर दिया गया या बीच में ही बंद कर दिया गया.


विधानसभा में पेश रिपोर्ट में किसानों से धान खरीद की स्थिति का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि निगम में धान खरीद के लक्ष्य को पूरा नहीं किया. वर्ष 2018-22 तक 18.29 लाख एमटी धान खरीदने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था. हालांकि इसके मुकाबले सिर्फ 16.47 लाख एमटी धान की खरीद हुई.

 

ऑडिट के दौरान पाया गया कि इस अवधि में 1.59 लाख किसानों से धान खरीदा गया. नियमानुसार किसानों को दो किस्तों में धान की कीमत का भुगतान करना था. लेकिन 79-98 प्रतिशत किसानों को भुगतान करने में दो साल से अधिक (775 दिन तक) तक देर हुई. सिर्फ इतना ही नहीं निर्धारित समय सीमा के चार साल बाद भी 1741 किसानों को धान के बदले 8.64 करोड़ रुपये का भुगतान नहीं किया गया. 

 

ऑडिट के दौरान पाया गया कि वर्ष 2018-22 तक की अवधि में लैम्पस पैक्स द्वारा 20.77 करोड़ रुपये मूल्य का 10.21 एमटी धान मिलरों को नहीं दिया गया. इसके अलावा 33 मिलरों ने इसी अवधि में मिलिंग के लिए उठाये गये धान के बदले एफसीआई में चावल जमा नहीं किया. मिलरों द्वारा जमा नहीं कराये गये चावल की कीमत 72.81 करोड़ रुपये है. लेकिन सरकार ने इन मिलरों और लैम्पस पैक्स के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं की.

 


रिपोर्ट में झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड की चर्चा करते हुए कहा गया है कि मौजूदा सप्लायरों को ऑर्डर देने के बदले निगम ने टेंडर किया. इससे निगम के ऊंची कीमत पर समान खरीदने पड़ा. इससे निगम के 5.93 करोड़ को अतिरिक्त खर्च करना पड़ा. निगम द्वारा डीटीआर मीटर में मॉडम ट्रांसमिशन उपकरण नहीं लगाने से इस मद ने किया गया 4.31 करोड़ रुपये का खर्च बेकार साबित हुआ. ऊर्जा उत्पादन निगम के प्रबंधन निदेशक द्वारा मरम्मत कार्य सौपने के लिए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल नहीं किया. इससे सिकिदरी हाईडल प्रोजेक्ट में 8.46 करोड़ रुपये मूल्य के बिजली उत्पादन का नुकसान हुआ.

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