- एक दशक से अधिक समय से जांच लंबित रहने पर कोर्ट नाराज
- व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह होंगे अधिकारी
- धनबाद, पलामू और गुमला के एसपी को निर्देश
- लंबित विभागीय मामलों का भी करना होगा निष्पादन
Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य के विभिन्न जिलों में पुलों के ध्वस्त होने से जुड़े मामलों की लंबित पुलिस जांच को तीन महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया है. अदालत ने धनबाद, पलामू और गुमला के पुलिस अधीक्षकों (एसपी) को संबंधित प्राथमिकी की जांच जल्द पूरी कर सक्षम न्यायालय में अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है. साथ ही, ग्रामीण विकास विभाग के सचिव को संबंधित अधिकारियों के खिलाफ लंबित विभागीय कार्यवाही तीन महीने के भीतर तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने का निर्देश दिया है. हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की खंडपीठ ने पंकज कुमार यादव की ओर से दायर जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए ये निर्देश दिए.
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अदालत ने पुलों के ध्वस्त होने के मामलों में एक दशक से अधिक समय तक जांच लंबित रहने पर गंभीर चिंता जताई. खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि संबंधित अधिकारियों को निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद अनुपालन शपथपत्र दाखिल करना होगा. इसमें देरी होने पर उसका स्पष्ट कारण बताना होगा और संबंधित अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह होंगे.
पुलों के ध्वस्त होने और भ्रष्टाचार की जांच की मांग
याचिकाकर्ता ने राज्य के विभिन्न जिलों में पुलों के ध्वस्त होने के मामलों की जांच कराने, ग्रामीण विकास विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने और तत्कालीन मुख्य अभियंता तथा वर्तमान प्रभारी अभियंता प्रमुख बीरेंद्र राम के खिलाफ जांच कराने की मांग की थी.
याचिका में आरोप लगाया गया था कि धनबाद, खूंटी, पलामू और गुमला में कई पुलों के ध्वस्त होने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई. याचिकाकर्ता ने प्रधान महालेखाकार की ऑडिट रिपोर्ट और मीडिया में प्रकाशित खबरों का हवाला देते हुए नए सिरे से जांच कराने की मांग की थी.
याचिका में बीरेंद्र राम के भतीजे आलोक रंजन के पास से करीब 2.45 करोड़ रुपये नकद बरामद होने का मामला भी उठाया गया था. याचिकाकर्ता का आरोप था कि यह राशि भ्रष्टाचार से अर्जित की गई थी और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए. उन्होंने बीरेंद्र राम को प्रभारी अभियंता प्रमुख के पद से हटाने की भी मांग की थी.
ईडी की जांच में अभियोजन शिकायत दाखिल
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि बीरेंद्र राम के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने धनशोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत कार्रवाई की है. राज्य सरकार के शपथपत्र के अनुसार, 21 अप्रैल 2023 को बीरेंद्र कुमार राम सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ अभियोजन शिकायत दाखिल की गई थी. संबंधित विशेष अदालत ने 29 अप्रैल 2023 को इसका संज्ञान लिया और मामला फिलहाल विचाराधीन है.
हाईकोर्ट ने ईडी को जांच शुरू करने और उसकी स्थिति की रिपोर्ट देने से संबंधित याचिका की मांगों को निष्प्रभावी माना. अदालत ने कहा कि जब जांच के बाद अभियोजन शिकायत दाखिल हो चुकी है और विशेष अदालत संज्ञान ले चुकी है, तो उसी विषय पर समानांतर निर्देश देने की आवश्यकता नहीं है.
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी सरकारी अधिकारी को जांच लंबित रहने के दौरान पद पर बनाए रखना है या नहीं, यह सामान्यतः राज्य सरकार और सक्षम अनुशासनिक प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र का विषय है. किसी वैधानिक प्रावधान के उल्लंघन का आधार प्रस्तुत नहीं किए जाने के कारण बीरेंद्र राम को पद से हटाने की मांग भी खारिज कर दी गई.
कई पुलों के मामले में पहले ही हुई थी कार्रवाई
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में दाखिल शपथपत्र में बताया कि पुलों के ध्वस्त होने के विभिन्न मामलों में विभागीय जांच, तकनीकी जांच और कार्रवाई की गई है. कई मामलों में संबंधित इंजीनियरों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की गई, ठेकेदारों पर कार्रवाई हुई और प्राथमिकी भी दर्ज की गई.
धनबाद के निरसा में बराकर नदी पर वर्ष 2009 में पुल ध्वस्त होने के मामले में संबंधित अभियंता को निलंबित किया गया था. विभागीय कार्यवाही शुरू करने के साथ ठेकेदार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई और उसे दस वर्षों के लिए ब्लैकलिस्ट किया गया. बीआईटी मेसरा से तकनीकी जांच भी कराई गई. बाद में वहां नया पुल बनाया गया, जिस पर आवागमन चालू है.
खूंटी के कर्रा प्रखंड में तजना नदी पर वर्ष 2015 में पुल क्षतिग्रस्त होने के मामले में संबंधित अभियंता के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की गई. ठेकेदार के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर उसे ब्लैकलिस्ट किया गया. पुल की मरम्मत के बाद आवागमन बहाल कर दिया गया.
पलामू के डालटनगंज में कोयल नदी पर पुल ध्वस्त होने के मामले में विभागीय और तकनीकी जांच कराई गई. बीआईटी मेसरा ने भी तकनीकी मूल्यांकन किया. इसके बाद संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू हुई और ठेकेदार पर कार्रवाई की गई. क्षतिग्रस्त पुल के स्थान पर नया पुल बनाया गया.
गुमला जिले में विभिन्न नदियों पर पुलों के क्षतिग्रस्त होने के मामलों में भी राज्य सरकार ने कार्रवाई की जानकारी दी. वर्ष 2011 में मानसून के दौरान पुलों को नुकसान पहुंचने के बाद तत्कालीन अधीक्षण अभियंता और 17 कनीय अभियंताओं को निलंबित किया गया था.
विभागीय जांच में निर्माण कार्य की गुणवत्ता और निगरानी से जुड़ी खामियां भी सामने आई थीं. संबंधित ठेकेदार को अपने खर्च पर क्षतिग्रस्त हिस्से का पुनर्निर्माण करने का निर्देश दिया गया था. कई स्थानों पर नए पुलों का निर्माण कराया गया या उन्हें स्वीकृति दी गई.
नई जांच और केंद्रीय एजेंसी को मामला सौंपने की मांग खारिज
हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, पुलों के ध्वस्त होने के मामलों में विभागीय जांच और स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन कराया गया था. संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों के खिलाफ भी कार्रवाई की गई.
याचिकाकर्ता ऐसा कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके, जिससे यह साबित हो कि पूर्व की जांच सतही थी या उसमें ऐसी गंभीर खामी थी, जिसके कारण नए सिरे से जांच कराना आवश्यक हो.
अदालत ने कहा कि जनहित याचिका के माध्यम से वर्षों पहले हुई तकनीकी जांच और विभागीय कार्रवाई पर अपीलीय अदालत की तरह पुनर्विचार नहीं किया जा सकता. इसी आधार पर पुलों के ध्वस्त होने के मामलों में व्यापक नई जांच कराने और केंद्रीय एजेंसी से जांच कराने की मांग खारिज कर दी गई.
खंडपीठ ने यह भी कहा कि प्रवर्तन निदेशालय को सामान्य जांच एजेंसी के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. पीएमएलए के तहत उसकी कार्रवाई के लिए कानून में निर्धारित शर्तों का पूरा होना आवश्यक है.
एक दशक तक जांच लंबित रहने पर जताई चिंता
हालांकि, हाईकोर्ट ने पुलों के ध्वस्त होने से संबंधित प्राथमिकी की जांच वर्षों तक लंबित रहने पर गंभीर चिंता जताई. अदालत ने कहा कि धनबाद, पलामू और गुमला में वर्ष 2009 से 2015 के बीच दर्ज मामलों की जांच अब तक पूरी नहीं हुई है. आपराधिक जांच को एक दशक से अधिक समय तक लंबित रखना न्याय प्रशासन और संबंधित पक्षों के अधिकारों, दोनों के लिए उचित नहीं है.
खंडपीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित न्याय का अधिकार सुनिश्चित है. यह अधिकार केवल मुकदमे की सुनवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि जांच, पूछताछ, सुनवाई और अपील के विभिन्न चरणों पर भी लागू होता है. अनावश्यक देरी से आपराधिक न्याय व्यवस्था प्रभावित होती है और दोषियों के बच निकलने की आशंका बढ़ती है.
हाईकोर्ट के प्रमुख निर्देश
तीन महीने में पुलिस जांच पूरी करें: धनबाद, पलामू और गुमला के एसपी संबंधित पुलों के ध्वस्त होने के मामलों में लंबित जांच जल्द पूरी कर संबंधित न्यायालयों में अंतिम रिपोर्ट दाखिल कराएं. इसके लिए अदालत ने तीन महीने की अवधि को प्राथमिकता देने का निर्देश दिया है.
विभागीय कार्यवाही पूरी करें: ग्रामीण विकास विभाग के सचिव संबंधित अधिकारियों के खिलाफ लंबित विभागीय कार्यवाही की निगरानी करेंगे और उसे तीन महीने के भीतर तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे.
पीएमएलए मामले की सुनवाई में तेजी लाएं: संबंधित विशेष अदालत बीरेंद्र राम और अन्य आरोपियों के खिलाफ लंबित धनशोधन मामले की सुनवाई कानून के अनुसार जल्द पूरी करने का प्रयास करेगी.
अनुपालन शपथपत्र दाखिल करना होगा: संबंधित जिलों के एसपी और ग्रामीण विकास विभाग के सचिव निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद हाईकोर्ट में अनुपालन शपथपत्र दाखिल करेंगे.
देरी का स्पष्ट कारण बताना होगा: यदि तय समय में पुलिस जांच या विभागीय कार्यवाही पूरी नहीं होती है, तो संबंधित अधिकारी शपथपत्र में देरी के सटीक कारण बताएंगे. अदालत ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह ठहराया है.
हाईकोर्ट ने इन निर्देशों के साथ जनहित याचिका का निष्पादन कर दिया. अदालत की रजिस्ट्री को फैसले की प्रति 15 दिनों के भीतर मुख्य सचिव, ग्रामीण विकास विभाग के सचिव, संबंधित तीन जिलों के एसपी और रांची की पीएमएलए विशेष अदालत के न्यायाधीश को भेजने का निर्देश भी दिया गया है, ताकि आदेश का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके.
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