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RU में संस्थान निदेशक हटाने व नई नियुक्ति पर विवाद, डॉ. मयंक मिश्रा ने लगाए गंभीर आरोप

Ranchi : रांची विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज (ILS) में निदेशक पद से हटाए जाने और नए निदेशक की नियुक्ति को लेकर विवाद गहरा गया है. संस्थान के पूर्व निदेशक डॉ. मयंक मिश्रा ने विश्वविद्यालय प्रशासन को भेजे एक विस्तृत ईमेल में कई गंभीर आरोप लगाए हैं और पूरी प्रक्रिया को अवैध, मनमानी और नियमों के विरुद्ध बताया है. 

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डॉ. मिश्रा ने बताया कि 2 मार्च 2026 को दोपहर 2:43 बजे उन्हें ईमेल के माध्यम से 28 फरवरी 2026 का रिलीविंग ऑर्डर प्राप्त हुआ. इसी के साथ 2 मार्च 2026 को जारी एक अन्य पत्र में उन्हें रांची विश्वविद्यालय के सोशल साइंस के डीन डॉ. बिनोद नारायण को कार्यभार सौंपने का निर्देश दिया गया.

 

BCI और UGC मानकों के उल्लंघन का आरोप

डॉ. मिश्रा का आरोप है कि डॉ. बिनोद नारायण के पास बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और UGC के मानकों के अनुसार आवश्यक योग्यता - संबंधित विषय में पीएचडी और शिक्षण अनुभव नहीं है, इसलिए उनकी नियुक्ति स्वतः अवैध (void ab initio) है. उन्होंने कहा कि यह नियुक्ति कानूनी शिक्षा के लिए BCI के नियमों का उल्लंघन है.

 

उन्होंने यह भी बताया कि इस मुद्दे पर झारखंड हाईकोर्ट में W.P.(C)–141/2026 नामक याचिका पहले से लंबित है, जिसमें छात्रों ने भी आपत्ति उठाई है.


ईमेल में डॉ. मिश्रा ने कहा कि रांची विश्वविद्यालय के वर्तमान कुलपति प्रभारी (In-Charge) हैं, इसलिए उन्हें वरिष्ठ प्रशासनिक पदों (जैसे निदेशक या विभागाध्यक्ष) पर नई नियुक्ति करने का अधिकार नहीं है. उन्होंने विश्वविद्यालय से यह स्पष्ट करने को कहा है कि किस कानूनी प्रावधान के तहत यह निर्णय लिया गया.


डॉ. मिश्रा के अनुसार, 2019 में ILS की स्थापना के बाद से अब तक यह नौवीं बार है जब निदेशक या प्रभारी निदेशक बदले गए हैं. उन्होंने कहा कि बार-बार अस्थायी और अनुबंध आधारित नियुक्तियां BCI के लीगल एजुकेशन नियम 2008 के शेड्यूल-3, रूल-16 का उल्लंघन हैं और इससे संस्थान में स्थिर प्रशासनिक व्यवस्था नहीं बन पा रही है.


डॉ. मिश्रा ने अपने ईमेल में घटनाक्रम को क्रमवार बताते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन पर दुर्भावनापूर्ण और प्रतिशोधपूर्ण कार्रवाई का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि -

विश्वविद्यालय ने उनके अनुरोध के बावजूद रांची विश्वविद्यालय का पैनल अधिवक्ता उपलब्ध नहीं कराया.

विश्वविद्यालय ने उन्हें हाईकोर्ट में चल रही दो याचिकाओं—W.P.(C)-141/2026 और W.P.(S)-384/2026—में काउंटर एफिडेविट दाखिल नहीं करने का निर्देश दिया.

उनके द्वारा नियुक्त अधिवक्ता की फीस के लिए जारी चेक को अनौपचारिक निर्देश देकर रोक दिया गया.

 

इस मामले में डॉ. डी.के. सिंह (प्रभारी कुलपति), डॉ. एम.सी. मेहता (डायरेक्टर-CVS) और डॉ. स्मृति सिंह (डिप्टी डायरेक्टर-CVS) के नामों का भी उल्लेख किया गया है. उन्होंने कहा कि डॉ. नितेश राज, जो ILS में संयुक्त हस्ताक्षरकर्ता हैं, उनके हस्ताक्षर के बिना चेक जारी नहीं हो सकता था.


बिना नोटिस हटाने का आरोप

डॉ. मिश्रा का कहना है कि उन्होंने दो बार अनुबंध विस्तार का अनुरोध किया, लेकिन विश्वविद्यालय ने उस पर कोई निर्णय नहीं लिया.

उनके अनुसार उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना या डिसएंगेजमेंट पत्र के हटा दिया गया.

28 फरवरी 2026 को रिलीविंग लेटर तैयार किया गया और 2 मार्च को भेजा गया.

उन्होंने 2 मार्च के लिए CL (कैजुअल लीव) मांगी थी, जिसे भी अस्वीकार कर दिया गया.

 

ईमेल में यह भी कहा गया है कि नए निदेशक डॉ. बिनोद नारायण ने 3 मार्च 2026 को पदभार ग्रहण किया, जो कि घोषित अवकाश का दिन था.

 

संस्थान बंद करने की चर्चा का आरोप

डॉ. मिश्रा ने दावा किया कि CVS की डिप्टी डायरेक्टर डॉ. स्मृति सिंह ने बैठकों के दौरान कहा था कि यदि BCI नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई होती है तो ILS को बंद कर दिया जाएगा और वहां कोई नया कोर्स शुरू कर दिया जाएगा. उन्होंने आरोप लगाया कि ILS के छात्रों को छोटानागपुर लॉ कॉलेज, नामकुम या राज्य के किसी अन्य संस्थान में स्थानांतरित करने की भी चर्चा हुई थी.


डॉ. मिश्रा ने कहा कि विश्वविद्यालय की इस कार्रवाई से ILS के 400 से अधिक छात्रों का भविष्य दांव पर लग सकता है. उन्होंने आरोप लगाया कि संस्थान के बुनियादी ढांचे और संसाधनों को मजबूत करने के लिए उन्होंने कई बार विश्वविद्यालय को पत्र लिखा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.


ईमेल में यह भी आरोप लगाया गया है कि नए निदेशक की नियुक्ति का उद्देश्य हाईकोर्ट में दाखिल काउंटर एफिडेविट को प्रभावित करना या वापस लेने का प्रयास हो सकता है.

 

उन्होंने कहा कि यदि ऐसा होता है तो ILS के छात्रों को छोटानागपुर लॉ कॉलेज, नामकुम में स्थानांतरित करने की कोशिश की जा सकती है, जहां BBA-LLB (Hons.) का नया कोर्स शुरू किया जा रहा है.

 

विश्वविद्यालय प्रशासन पर गंभीर आरोप

डॉ. मिश्रा ने अंत में कहा कि प्रभारी कुलपति, रजिस्ट्रार, लॉ फैकल्टी के डीन, CVS के निदेशक और डिप्टी निदेशक की कार्रवाई “अवैध, असंवैधानिक और शक्ति का दुरुपयोग” है. उन्होंने आरोप लगाया कि इन निर्णयों से ILS में पढ़ रहे वर्तमान और पूर्व छात्रों की डिग्री और भविष्य पर भी खतरा उत्पन्न हो सकता है.

 

फिलहाल इस मामले को लेकर रांची विश्वविद्यालय की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, जबकि मामला झारखंड हाईकोर्ट में विचाराधीन है.

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