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झारखंड में नियुक्तियों में भ्रष्टाचार-02: बाबूलाल ने जिसे जबरन JPSC सदस्य बनाया वही निकला किंगपिन

बाबूलाल मरांडी की अनुशंसा पर सदस्य बनाये गये दिलीप प्रसाद JPSC नियुक्ति घोटाले के किंगपिन के रूप में चिह्नित किये गये. उन्होंने राज्य के प्रथम मुख्य सचिव विजय शंकर दुबे के विरोध को नजरअंदाज करते हुए दिलीप प्रसाद को JPSC में सदस्य नियुक्त करने की अनुशंसा की. आगे पढ़ें....
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  • - मरांडी ने तब के मुख्य सचिव वीएस दुबे के विरोध के बावजूद दिलीप प्रसाद को जेपीएससी सदस्य बनाया.
  • - पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने उसी दिलीप प्रसाद को जेपीएससी का अध्यक्ष बनाया.
  • - दिलीप प्रसाद के कार्यकाल में ही जेपीएससी में हुई नियुक्तियों में भ्रष्टाचार हुआ.
  • - फटीक चंद्र हेंब्रम को अध्यक्ष बनाने के लिए मरांडी ने जेपीएससी के गठन में देरी की.

Ranchi: बाबूलाल मरांडी ने जबरन जिनके नाम की अनुशंसा की, झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) का सदस्य बनाया, वही दिलीप प्रसाद JPSC नियुक्ति घोटाले के किंगपिन के रूप में चिह्नित किये गये. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने राज्य के प्रथम मुख्य सचिव विजय शंकर दुबे के विरोध को नजरअंदाज करते हुए दिलीप प्रसाद को JPSC में सदस्य नियुक्त करने की अनुशंसा की थी. मरांडी के बाद मुख्यमंत्री बने अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में दिलीप प्रसाद को पहले कार्यकारी अध्यक्ष और बाद में अध्यक्ष बनाया गया. दिलीप प्रसाद के कार्यकाल में ही व्याख्याता नियुक्ति के अलावा जेपीएसी-वन और जेपीएससी-2 में नियुक्ति घोटाले हुए.

 

पहले आपने पढ़ाः झारखंड में नियुक्तियों में भ्रष्टाचार-01:  विधानसभा से हुई शुरूआत

 

राज्य के प्रथम मुख्य सचिव विजय शंकर दुबे ने अपने सेवानिवृति के वक्त मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी को एक पत्र लिखा था. इसमें उन्होंने लिखा था कि लोक सेवा आयोग और बिजली बोर्ड दो ऐसी संस्थाएं हैं, जो राज्य के आगे बढ़ने में मददगार होंगी. इसलिए इन दोनों संस्थाओं को किसी भी तरह की अनियमितता से बचाये रखना जरूरी है. 


संभवतः नियुक्तियों के मुद्दे पर उभरे विवाद की वजह से ही वीएस दुबे को इन संस्थाओं में गड़बड़ी होने की आशंका थी. उनकी यह आशंका सही साबित हुई और दोनों ही संस्थाएं विभिन्न प्रकार की गड़बड़ियों की शिकार हो गयी. बाबूलाल मरांडी के कार्यकाल में ही इन दोनो संस्थानों में भ्रष्टाचार शुरु हुआ, जिसकी जड़ें गहरी होती चली गयीं.


राज्य गठन के बाद बाबूलाल मरांडी राज्य के पहले मुख्यमंत्री और विजय शंकर दुबे राज्य के पहले मुख्य सचिव बने थे. बाबूलाल 15 नवंबर 2000 से 17 अप्रैल 2002 तक राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यरत रहे. उन्हीं के कार्यकाल में JPSC का गठन (खास व्यक्ति को अध्यक्ष बनाने के लिए बहुत देर से) हुआ. राज्य सेवा के अधिकारियों की नियुक्ति के लिए बने इस आयोग में सदस्यों की नियुक्ति को लेकर मुख्य सचिव विजय शंकर दुबे से विवाद हुआ. फटीक चंद्र हेम्ब्रम को आयोग का पहला अध्यक्ष नियुक्त किया गया. अध्यक्ष बनने से पहले वह ऑल इंडिया रेडियो के उप-महानिदेशक के पद पर कार्यरत थे. 

 

फटीक चंद्र हेंब्रम के नाम पर मुख्य सचिव सहमत थे. लेकिन दिलीप प्रसाद को आयोग का सदस्ये बनाने पर सहमत नहीं थे. उन्होंने दिलीप प्रसाद को आयोग का सदस्य बनाये के मुद्दे पर यह कहते हुए विरोध किया कि इतने जूनियर व्यक्ति को सदस्य बनाया जाना सही नहीं है. लेकिन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने इस विरोध को नजरअंदाज करते हुए दिलीप प्रसाद को आयोग का सदस्य बनाये जाने की अनुशंसा राज्यपाल से की. राज्यपाल ने इसे स्वीकृत कर लिया. इसके बाद दिलीप प्रसाद आयोग के सदस्य बने. 

 

सदस्य के रूप में उन्होंने 29 जनवरी 2002 से 21 जनवरी 2004 तक काम किया. बाबूलाल के ही कार्यकालय में इंजीनियर श्याम नारायण को भी आयोग का सदस्य बनाये जाने की अनुशंसा की गयी थी. मुख्य सचिव ने इसका विरोध करते हुए यह लिखा था कि इस इंजीनियर को निंदन की सजा दी गयी है. ऐसे व्यक्ति को आयोग का सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए. मुख्य सचिव के विरोध को यह कहते हुए नजरअंदाज किया गया था कि निंदन के सजा की अवधि समाप्त हो गयी है. लेकिन राज्यपाल ने इस नाम पर सहमति नहीं दी.


वर्ष 2004 में आयोग के पहले अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त हुआ. उस वक्त तक अर्जुन मुंडा राज्य के मुख्यमंत्री बन गये थे. वह 18 मार्च 2003 से दो अप्रैल 2005 तक मुख्यमंत्री रहे. आयोग के सदस्य के रूप में दिलीप प्रसाद का कार्यकाल 21 अप्रैल 2004 को समाप्त हुआ. अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में दिलीप प्रसाद को आयोग का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया. 

 

कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में दिलीप प्रसाद ने 22 जनवरी 2004 से 22 सितंबर 2004 तक कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में काम किया. इसके बाद उन्हें आयोग का नियमित अध्यक्ष बनाया गया. वह अध्यक्ष के रूप में 13 मई 2010 तक काम किया. अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में ही राधागोविंद नागेश, गोपाल प्रसाद और शांति देवी को आयोग का सदस्य बनाया गया. 

 

JPSC में हुए नियुक्ति घोटाले में बाबूलाल के कार्यकाल में नियुक्त सदस्य, अर्जुन मुंडा के कार्यकाल में नियुक्त अध्यक्ष और सदस्य सभी भ्रष्टाचार में शामिल हो गये. व्याख्याता नियुक्ति, डीएसपी नियुक्ति, इंजीनियर नियुक्ति समेत अन्य नियुक्तियों में भ्रष्टाचार किया गया. हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई ने नियुक्ति घोटाले की जांच कर आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया. इसके बाद सभी को जेल की हवा खानी पड़ी.

 

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