- ट्रिब्यूनल के आदेश को कोर्ट ने रखा बरकरार
- ट्रिब्यूनल ने अधिग्रहित जमीन का बाजार मूल्य 600 रुपये प्रति डिसमिल किया था तय
- सीसीएल का कहना था ट्रिब्यूनल ने मुआवजा अत्यधिक बढ़ा दिया और विकास लागत में कटौती नहीं की है
Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने कोल बेयरिंग एरियाज एक्ट, 1957 के तहत अधिग्रहित जमीन के मुआवजे से जुड़े चार प्रथम अपील मामलों में सीसीएल (सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड) की अपीलें खारिज कर दीं. यह फैसला हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति अनुभा रावत चौधरी की कोर्ट ने सुनाया है.
दरअसल, यह मामला हजारीबाग जिले के मांडू थाना अंतर्गत पिंडरा गांव की भूमि अधिग्रहण से जुड़ा था. सीसीएल ने वर्ष 1981 में कोयला खनन परियोजना के लिए खाता संख्या 4 और 6 की जमीन अधिग्रहित की थी. बाद में जमीन मालिकों ने मुआवजा कम होने का आरोप लगाते हुए अधिक मुआवजे की मांग की थी.
ए.जे.सी. सह ट्रिब्यूनल अंडर कोल बियरिंग एरिया (ए एंड डी) रांची ने 30 मई 2013 को फैसला देते हुए अधिग्रहित जमीन का बाजार मूल्य 600 रुपये प्रति डिसमिल तय किया था. साथ ही 30 प्रतिशत सोलाटियम, 12 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि (एस्केलेशन) और बढ़ी हुई राशि पर 9 प्रतिशत और बाद के वर्षों में 15 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश दिया था.
सीसीएल ने हाईकोर्ट में अपील कर कहा था कि ट्रिब्यूनल ने मुआवजा अत्यधिक बढ़ा दिया है और विकास लागत (डेवलपमेंट कॉस्ट) की कटौती नहीं की गई. हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जमीन को कोयला खनन के लिए अधिग्रहित किया गया था और रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि जमीन के विकास पर कोई विशेष खर्च होना था. अदालत ने कहा कि बिना साक्ष्य के विकास लागत में कटौती नहीं की जा सकती.
कोर्ट ने यह भी माना कि ट्रिब्यूनल ने पूर्व के समान मामलों, विशेषकर लइयो गांव से जुड़े निर्णयों के आधार पर 600 रुपये प्रति डिसमिल की दर तय की थी, जो उचित है. इसके साथ ही हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को बरकरार रखते हुए सीसीएल की सभी अपीलें खारिज कर दीं.
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