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Court News : अवैध वाहन नीलामी मामले में HC ने तत्कालीन लातेहार DC को किया तलब

झारखंड में खनन कानूनों के तहत प्रशासनिक शक्तियों के कथित दुरुपयोग से जुड़े एक मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. कोर्ट ने तत्कालीन उपायुक्त लातेहार भोरे सिंह यादव को  कोर्ट में हाजिर होने का निर्देश दिया. साथ ही मामले में वर्तमान उपायुक्त, लातेहार और जिला खनन पदाधिकारी, लातेहार को भी न्यायालय में उपस्थित रहने का निर्देश दिया है.
 
  • वर्तमान DC लातेहार व जिला खनन पदाधिकारी, लातेहार को भी हाजिर रहने का निर्देश

Ranchi: झारखंड में खनन कानूनों के तहत प्रशासनिक शक्तियों के कथित दुरुपयोग से जुड़े एक मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. कोर्ट ने तत्कालीन उपायुक्त लातेहार भोर सिंह यादव को कोर्ट में हाजिर होने का निर्देश दिया. साथ ही मामले में वर्तमान उपायुक्त, लातेहार और जिला खनन पदाधिकारी, लातेहार को भी न्यायालय में उपस्थित रहने का निर्देश दिया है.

 

मामले की सुनवाई हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एमएस सोनक एवं न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ में हुई.  अशोक सिंह की ओर से याचिका दाखिल की गई है. अगली सुनवाई बुधवार 13 मई को होगी.
 

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विनोद सिंह ने कोर्ट को बताया कि हाइकोर्ट और खनन आयुक्त द्वारा पूर्व में की गई न्यायिक टिप्पणियों और आदेशों के बावजूद जिला प्रशासन लगातार ऐसी कार्रवाई का बचाव कर रहा है, जो प्रथम दृष्टया अधिकार क्षेत्र के अभाव में की गई प्रतीत होती है. मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने तत्कालीन उपायुक्त लातेहार भोर सिंह यादव को अगली सुनवाई की तिथि पर सुबह 10:30 बजे व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने का निर्देश दिया.

 

दरअसल, यह मामला झारखंड मिनरल (प्रिवेंशन ऑफ इलीगल माइनिंग ट्रांसपोर्टेशन एंड स्टोरेज) रूल 2017 के रूल 11 (V) के तहत वाहन जब्ती एवं नीलामी की कार्रवाई से संबंधित है. याचिकाकर्ता का कहना है कि उक्त प्रावधान को पूर्व में ही हाईकोर्ट द्वारा Ultra Vires घोषित किया जा चुका है, जिसके बाद उक्त प्रावधान के आधार पर की गई जब्ती कार्रवाई कानूनन टिकाऊ नहीं रह जाती.
  

सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष यह बात आई कि खनन आयुक्त द्वारा वाहन को रॉयल्टी एवं दंड राशि जमा कराकर मुक्त करने का निर्देश दिए जाने के बावजूद जिला प्रशासन ने कथित रूप से वाहन की नीलामी कर उसे तीसरे पक्ष को हस्तांतरित कर दिया. पूर्व की सुनवाईयों में हाईकोर्ट ने यह गंभीर प्रश्न उठाया था कि पुनरीक्षण याचिका दायर करने हेतु उपलब्ध वैधानिक अवधि समाप्त होने से पहले वाहन की नीलामी कैसे कर दी गई.

 

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि ऐसी कार्रवाई प्रथम दृष्टया मनमानी प्रतीत होती है और इससे वादी के वैधानिक अधिकारों को गंभीर क्षति पहुंची है. कोर्ट ने याचिकाकर्ता की आर्थिक स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की थी. कोर्ट के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि वाहन जब्ती एवं नीलामी के कारण याचिकाकर्ता पर बैंक ऋण, बढ़ते ब्याज और आजीविका संबंधी कठिनाइयों का अतिरिक्त बोझ पड़ता गया.

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