- झारखंड में 90 दिनों में 13,647 अपराध
- 329 हत्याएं, 434 अपहरण..
- बढ़ते जुर्म के ये आंकड़े क्या पुलिसिंग की सुस्ती की दास्तान बयां कर रहे हैं?
Ranchi : झारखंड में बढ़ते अपराध ने ना सिर्फ आम जनता की चिंता बढ़ाई है, बल्कि पुलिस महकमे की कारकर्दगी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. हालात ऐसे हैं कि अपराध का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है, लेकिन जमीनी पुलिसिंग का असर कई जगह दिखाई नहीं दे रहा है. गुफ्तगू अब सिर्फ चौपालों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर वारदात के बाद लोगों की जुबान पर एक ही बात है, क्या अपराधियों में अब कानून का कोई खौफ बचा भी है?
झारखंड पुलिस के साल 2026 की पहली तिमाही के आंकड़े भी कम चिंताजनक तस्वीर पेश नहीं करते. जनवरी से मार्च 2026 के बीच राज्यभर में 13,647 आपराधिक मामले दर्ज किए गए. इनमें जनवरी में 4,930, फरवरी में 4,155 और मार्च में 4,562 मामले शामिल हैं. सबसे अधिक 9,837 मामले "अन्य अपराध" श्रेणी में दर्ज हुए. जबकि हत्या, अपहरण, दुष्कर्म, चोरी और दंगों जैसी गंभीर घटनाएं लगातार पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज होती रहीं.
सबसे चिंताजनक आंकड़ें हत्या के हैं. झारखंड पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, सिर्फ तीन महीनों में 329 लोगों की हत्या कर दी गई है. इसमें जनवरी में 106, फरवरी में 89 और मार्च में 134 लोगों की जान ले ली गई है. यानी औसतन हर दिन तीन से चार लोगों की हत्या हुई है.
इसके अलावा 434 अपहरण के मामले दर्ज हुए, जिनमें जनवरी में 125, फरवरी में 128 और मार्च में 181 मामले शामिल हैं. फिरौती के लिए अपहरण के भी 9 मामले दर्ज होना इस बात का संकेत है कि संगठित अपराध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है.
महिलाओं की सुरक्षा भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. पहली तिमाही में 374 दुष्कर्म, 57 दहेज हत्या और 13 डायन हत्या के मामले दर्ज किए गए. ये आंकड़े सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़े उस तल्ख सच को भी उजागर करते हैं, जिससे निपटने के लिए सिर्फ पुलिस ही नहीं, पूरे समाज को गंभीर प्रयास करने होंगे.
संपत्ति संबंधी अपराध भी कम नहीं हुए. जनवरी से मार्च के बीच 1,703 चोरी, 447 घरों में चोरी, 40 सड़क लूट, 9 सड़क डकैती, 7 घर में घुसकर डकैती और 3 घर में घुसकर लूट के मामले दर्ज हुए. कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में 222 दंगे, 130 आर्म्स एक्ट, 28 नक्सल संबंधी मामले और 7 विस्फोटक अधिनियम के मामले भी पुलिस रिकॉर्ड का हिस्सा बने.
इन आंकड़ों के बीच पुलिस महकमे के भीतर की सुस्ती भी चर्चा का विषय बनी हुई है. पुलिस मुख्यालय तक पहुंचने वाली रिपोर्टों में कई जिलों की कार्यप्रणाली को लेकर नाराजगी की बातें सामने आती रही हैं. बताया जाता है कि मुख्यालय की ओर से मांगी गई सूचनाओं का जवाब कई जगह समय पर नहीं दिया गया. कई शिकायतें भी पहुंचीं, लेकिन वह फाइलों में ही दफन होकर रह गईं. न जवाबदेही तय हुई और न ही कार्रवाई की गई.
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