New Delhi : इन दिनों चुनाव आयोग चर्चा में है. खास कर बंगाल चुनाव में SIR को लेकर ममता बनर्जी के साथ हो रहे टकराव की खबरों सुर्खियों में है. मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है.
ममता बनर्जी का आरोप है कि चुनाव आयोग और भाजपा में मिलीभगत है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना का बातें महत्वपूर्ण हो जाती हैं, जो उन्होंने पटना में कही.
जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को पूरी तरह से स्वतंत्र रहना चाहिए. किसा भी राजनीतिक दबाव या प्रभाव का इन पर असर नहीं पड़ना चाहिए. ये संस्थाएं लोकतंत्र की मजबूत नींव हैं. इन संस्थाओं की स्वतंत्रता के बिना लोकतंत्र सही मायने में नहीं चल सकता. चुनाव कोई रूटीन प्रक्रिया नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना ने शनिवार को पटना के चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में डॉ राजेंद्र प्रसाद स्मारक व्याख्यान में यह विचार रखे. जस्टिस नागरत्ना अधिकारों से परे संविधानवाद: संरचना क्यों मायने रखती है...विषय पर बोल रही थी. इस क्रम में उन्होंने कहा कि संविधान महज अधिकारों का दस्तावेज नहीं है, बल्कि संस्थाओं की मजबूती पर भी टिका है.
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि भारत निर्वाचन आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) और भारतीय वित्त आयोग का डिजाइन एक ही तरह का है. ये संस्थाएं बाहरी प्रभावों से मुक्त हैं जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ये संस्थाएं विशेषज्ञता पर आधारित हैं.
इन संस्थाओं को बाहरी प्रभावों से मुक्त रखा गया है. उनका काम ऐसे क्षेत्रों की निगरानी करना है, जहां निष्पक्षता बनाये रखना बेहद अहम होता है. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि ये ऐसा तंत्र है, जिससे राजनीतिक सत्ता बनती है.
जस्टिस ने कहा क समय पर चुनाव होने से सरकारें बदलती है और लोकतंत्र चलता रहता है. सवाल किया कि अगर इस प्रक्रिया पर काबू कर लिया जाये तो राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की शर्तें भी तय हो जाती हैं. इसीलिए भारत जैसे देश में चुनाव आयोग को स्वतंत्र रखना बेहद जरूरी है.
अपने व्याख्यान में जस्टिस नागरत्ना ने 1995 के टीएन शेषन बनाम भारत संघ मामले का जिक्र किया. कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने उस समय चुनाव आयोग को मजबूत संवैधानिक संस्था माना था. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर चुनाव आयोग ही उन पर निर्भर हों जो चुनाव लड़ते हैं तो निष्पक्षता कैसे बचेगी?
कहा कियह बात आज भी लागू होती है. जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि जब संवैधानिक ढांचा कमजोर हो जात है तो संस्थाएं एक-दूसरे पर नजर रखना छोड़ देती हैं. चुनाव होते रहते हैं, अदालतें चलती रहती हैं, कानून बनते रहते हैं, लेकिन सत्ता पर असली अंकुश नहीं रहता. इस कारण लोकतंत्र सिर्फ दिखावे का रह जाता है. नाम को रह जाता है.
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