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धनबादः सावधान! आपकी पतंग की डोर कहीं किसी की गर्दन न काट दे

बाजार में खूनी मांझे की बिक्री पर उठे सवाल


Dhanbad : मकर संक्रांति का त्योहार नजदीक आते ही आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से सजने लगा है. लेकिन इस उत्साह के पीछे 'खूनी मांझे' का साया भी मंडरा रहा है. सिंथेटिक, प्लास्टिक व कांच की परत चढ़े प्रतिबंधित मांझे न केवल पतंगें काट रहे हैं, बल्कि इंसानों और बेजुबान पक्षियों के लिए काल बन रहे हैं. इस गंभीर मुद्दे पर धनबाद बार एसोसिएशन के महासचिव जीतेंद्र कुमार सिंह ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं.


उन्होंने कहा कि प्लास्टिक व चाइनीज मांझा पर्यावरण व जन सुरक्षा के लिए इतना घातक है कि देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों व सुप्रीम कोर्ट ने इस पर पूर्ण प्रतिबंध लगा रखा है. उन्होंने सवाल उठाया कि जब यह मांझा प्रतिबंधित है, तो स्थानीय बाजारों में धड़ल्ले से कैसे बिक रहा है. प्रशासन को इसके स्रोत व सप्लाई चेन पर प्रहार करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि कोयलांचल में भी मांझे की चपेट में आने से होने वाले हादसे कोई नए नहीं हैं.


उन्होंने याद दिलाया कि धनबाद के एक वकील समेत कई लोग इस घातक डोर से गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं. बाइक सवारों के गले में मांझा फंसने से जान जाने तक का खतरा बना रहता है. यही नहीं, प्लास्टिक का धागा कभी गलता नहीं है जिससे यह मिट्टी को प्रदूषित करता है. धातु युक्त मांझा बिजली के तारों में फंसकर न केवल बिजली गुल करता है, बल्कि पतंग उड़ाने वाले को भी मौत का झटका (करंट) दे सकता है. ऐसे में अब प्रशासन को कड़े कदम उठाने होंगे. प्रतिबंधित मांझे की बिक्री या उपयोग करने वालों पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता-2023 की धारा 163 के तहत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए. दोषी पाए जाने पर भारी आर्थिक दंड व जेल का प्रावधान सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

 

जीतेंद्र कुमार सिंह ने अभिभावकों खासकर युवाओं से अपील की है कि वे खुशियों को मातम में न बदलने दें.केवल पारंपरिक सूती (कॉटन) धागे का ही प्रयोग करें. बच्चों को व्यस्त सड़कों, बिजली के खंभों व ऊंची छतों की बजाय खुले मैदानों में पतंग उड़ाने के लिए प्रेरित करें. घायल पक्षी दिखने पर तुरंत पशु हेल्पलाइन या स्थानीय संस्थाओं को सूचित करें.

 

वहीं, आम दुकानदारों व पतंगबाजों का कहना है कि वे वही सामान बेचते या खरीदते हैं जो बाजार में उपलब्ध होता है. उनका तर्क है कि यदि प्रशासन थोक विक्रेताओं पर नकेल कसे और केवल सूती (कॉटन) मांझा ही बाजार में उपलब्ध रहे, तो लोग मजबूरी में खतरनाक मांझा नहीं खरीदेंगे. मकर संक्रांति खुशियों का पर्व है इसे दूसरों की जान जोखिम में डालकर नहीं मनाया जाना चाहिए.

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