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धनबाद: खस्सी की मीट ने 12 साल तक बनाए रखी सामाजिक दूरी, पुलिस की पहल से भाईचारा कायम

क्या महज खस्सी के मांस के बंटवारे पर हुआ विवाद 12 साल तक चल सकता है? क्या एक ही गांव के लोग एक-दूसरे को पानी की एक बूंद के लिए तरसा सकते हैं? धनबाद जिले के पूर्वी टुंडी अंतर्गत रूपन पंचायत के लाहबेड़ा गांव में यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं बल्कि एक कड़वी हकीकत थी. लेकिन अब यहां नफरत की दीवार ढह चुकी है और भाईचारे की नई शुरुआत हुई है.
 

Dhanbad: क्या महज खस्सी के मांस के बंटवारे पर हुआ विवाद 12 साल तक चल सकता है? क्या एक ही गांव के लोग एक-दूसरे को पानी की एक बूंद के लिए तरसा सकते हैं? धनबाद जिले के पूर्वी टुंडी अंतर्गत रूपन पंचायत के लाहबेड़ा गांव में यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं बल्कि एक कड़वी हकीकत थी. लेकिन अब यहां नफरत की दीवार ढह चुकी है और भाईचारे की नई शुरुआत हुई है.

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खस्सी मीट से शुरू विवाद की जड़ 

यह मामला करीब 12 साल पहले चुनावी माहौल के दौरान शुरू हुआ था. एक खस्सी (बकरे) के मांस के बंटवारे को लेकर हुए मामूली विवाद ने पूरे गांव को ऊपर टोला और नीचे टोला के रूप में दो हिस्सों में बांट दिया. दोनों पक्षों के बीच बोलचाल बंद हो गई और एक-दूसरे का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया.

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यही नहीं विवाद इतना बढ़ा कि ऊपर टोला के लोगों ने नीचे टोला के ग्रामीणों को सार्वजनिक चापाकल, कुएं और तालाब से पानी लेने तक पर रोक लगा दी. इस बीच स्थानीय राजनीतिक हस्तक्षेप ने सुलह कराने के बजाय आग में घी डालने का काम किया. जिससे यह खाई साल दर साल गहरी होती चली गई.

 

प्रशासन की मैराथन बैठक और सुलह

अंधेरा तब छंटा जब सर्किल इंस्पेक्टर शाजिद हुसैन और थाना प्रभारी नीतीश कुमार ने इस मामले को गंभीरता से लिया. रूपन पंचायत के मुखिया सतीश मुर्मू के सहयोग से शुक्रवार को गांव में एक विशाल सामाजिक बैठक बुलाई गई.


प्रशासन ने ग्रामीणों को सख्ती के साथ कानून का पाठ पढ़ाया और संवेदनशीलता के साथ आपसी भाईचारे का महत्व समझाया. घंटों चली इस मैराथन चर्चा का परिणाम यह रहा कि 12 साल पुराना गतिरोध कुछ ही घंटों में समाप्त हो गया.


एकता का नया सवेरा

बैठक के अंत में जो दृश्य दिखा उसने सबकी आंखें नम कर दीं. 12 साल से एक-दूसरे के दुश्मन बने ग्रामीणों ने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाया. गांव में सामाजिक बहिष्कार को आधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया गया. जिस चापाकल पर कभी पहरा था. वह अब पूरे गांव की प्यास बुझाने का साझा केंद्र बन गया है. पुराने टूटे हुए रिश्ते फिर से जुड़ने लगे हैं और गांव के बुजुर्गों ने प्रशासन की इस पहल को ऐतिहासिक बताया है.

 

लाहबेड़ा गांव की यह तस्वीर पूरे समाज के लिए एक मिसाल है कि संवाद और सही नेतृत्व से बड़े से बड़े विवाद का अंत संभव है. आज गांव में फिर से उत्सव जैसा माहौल है.

 

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