Ranchi : बच्चा मुस्कुरा रहा होता है, लेकिन मां की चिंता कम नहीं होती. अक्सर पहली मांग यही होती है: डॉक्टर साहब, एंटीबायोटिक लिख दीजिए. डॉक्टर डे के अवसर पर बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. गरिमा दीप्ति ने कहा कि आज चिकित्सा क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक केवल बीमारी का इलाज नहीं, बल्कि एंटीबायोटिक को लेकर समाज में बनी गलत धारणाओं को बदलना भी है.
डॉ. गरिमा बताती हैं कि उनके क्लिनिक में आने वाले कई छोटे बच्चों को वायरल संक्रमण होता है, जहां एंटीबायोटिक की जरूरत नहीं होती. लेकिन बड़ी संख्या में अभिभावक यह मानकर आते हैं कि बिना एंटीबायोटिक के बच्चा ठीक नहीं होगा.
जब डॉक्टर एंटीबायोटिक नहीं लिखते, तो कई परिवार दूसरी क्लिनिक चले जाते हैं, मेडिकल दुकानों से बिना पर्ची दवा खरीद लेते हैं या घर में पहले से बची एंटीबायोटिक बच्चों को देना शुरू कर देते हैं. कई बार माता-पिता डॉक्टर के पास आने से पहले ही स्थानीय मेडिकल स्टोर या आसपास के लोगों की सलाह पर बच्चे को एंटीबायोटिक की कुछ खुराक दे चुके होते हैं.
इससे बीमारी की वास्तविक तस्वीर बदल जाती है और सही इलाज तय करना और मुश्किल हो जाता है.उनके अनुसार सबसे बड़ी समस्या यह है कि समाज में एंटीबायोटिक को जादुई दवा समझ लिया गया है. जबकि वायरल संक्रमण में एंटीबायोटिक बिल्कुल असर नहीं करती. सर्दी, सामान्य खांसी, वायरल बुखार और अधिकांश वायरल संक्रमण बिना एंटीबायोटिक के ठीक हो जाते हैं. इसके बावजूद जरूरत नहीं होने पर भी एंटीबायोटिक लेने की आदत तेजी से बढ़ रही है.
डॉ. गरिमा कहती हैं कि डॉक्टरों के सामने कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है, जहां विज्ञान और सामाजिक दबाव आमने-सामने खड़े हो जाते हैं. यदि डॉक्टर जांच की सलाह देते हैं तो कई परिवार आर्थिक कारणों से जांच नहीं कराना चाहते.
कई अभिभावक बार-बार अस्पताल आने में असमर्थ होते हैं. कुछ माता-पिता दूसरे बच्चों की देखभाल, नौकरी या रोजी-रोटी के कारण दोबारा अस्पताल नहीं आ पाते. ऐसे में वे डॉक्टर से कहते हैं कि पहले एंटीबायोटिक शुरू कर दीजिए, अगर ठीक नहीं हुआ तो बाद में जांच करा लेंगे. डॉक्टरों के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण होती है, क्योंकि चिकित्सा विज्ञान में हर बीमारी का शुरुआती चरण पूरी तरह निश्चित नहीं होता और छोटे बच्चों की हालत कई बार तेजी से बदल भी सकती है.
उन्होंने कहा कि यह केवल मरीज और डॉक्टर के बीच का मामला नहीं है, बल्कि पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा मुद्दा है. बिना पर्ची मेडिकल दुकानों पर एंटीबायोटिक मिल जाना, अपंजीकृत लोगों द्वारा दवा की सलाह देना, रिश्तेदारों और परिचितों की सलाह पर दवा शुरू कर देना, इलाज बीच में छोड़ देना और आर्थिक मजबूरियां—ये सभी कारण मिलकर एंटीबायोटिक के गलत इस्तेमाल को बढ़ावा देते हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) को दुनिया के सामने मौजूद सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरों में से एक मानता है. WHO के अनुसार बैक्टीरिया में बढ़ता प्रतिरोध भविष्य में निमोनिया, टीबी, यूरिन संक्रमण, रक्त संक्रमण और सर्जरी के बाद होने वाले संक्रमणों के इलाज को कठिन बना सकता है. एक बार यदि बैक्टीरिया किसी एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोधी हो जाए, तो वही दवा भविष्य में मरीज पर असर नहीं करती.
वर्ष 2022 में प्रकाशित प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट के वैश्विक अध्ययन के अनुसार वर्ष 2019 में दुनिया भर में लगभग 12.7 लाख लोगों की प्रत्यक्ष मौत एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के कारण हुई, जबकि 49.5 लाख मौतें किसी न किसी रूप में इससे जुड़ी थीं. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एंटीबायोटिक का अनियंत्रित उपयोग नहीं रुका, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और गंभीर हो सकती है.
भारत उन देशों में शामिल है जहां एंटीबायोटिक का उपयोग सबसे अधिक होता है. सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि बिना चिकित्सकीय सलाह दवा लेना, अधूरा कोर्स करना और जरूरत नहीं होने पर एंटीबायोटिक का इस्तेमाल भविष्य में गंभीर संकट पैदा कर सकता है.
डॉ. गरिमा कहती हैं कि डॉक्टर के लिए हर मरीज को एंटीबायोटिक लिख देना सबसे आसान रास्ता हो सकता है, क्योंकि इससे परिजनों की तत्काल चिंता कम हो जाती है. लेकिन इसका नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है. आज लिखी गई एक अनावश्यक एंटीबायोटिक भविष्य में किसी दूसरे मरीज के लिए जीवनरक्षक दवा को बेअसर बना सकती है.
उन्होंने कहा कि कई बार डॉक्टर की सबसे बड़ी जिम्मेदारी दवा लिखना नहीं, बल्कि दवा नहीं लिखना भी होती है. यदि बीमारी वायरल है, तो आराम, पर्याप्त तरल पदार्थ, बुखार की दवा, पोषण और नियमित निगरानी ही सबसे प्रभावी उपचार होता है. ऐसे मामलों में एंटीबायोटिक से लाभ नहीं, बल्कि नुकसान की आशंका बढ़ जाती है.
डॉक्टर डे के अवसर पर उन्होंने लोगों से अपील की कि डॉक्टर की सलाह के बिना कभी भी एंटीबायोटिक का सेवन न करें. किसी दूसरे व्यक्ति की बची हुई दवा बच्चों को न दें, मेडिकल स्टोर से बिना पर्ची एंटीबायोटिक न खरीदें और डॉक्टर द्वारा जितने दिनों का कोर्स बताया जाए, उसे बीच में न छोड़ें. उन्होंने कहा कि एंटीबायोटिक का सही उपयोग केवल एक मरीज की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सुरक्षा से जुड़ा विषय है. आज की छोटी-सी सावधानी आने वाले वर्षों में लाखों लोगों की जान बचाने में मदद कर सकती है.


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