Ranchi : कोरोना महामारी का वह दौर आज भी लोगों के जेहन में ताजा है. अस्पतालों के बाहर लंबी कतारें थीं, मरीजों की सांसें उखड़ रही थीं और डॉक्टर अपनी जान की परवाह किए बिना लगातार ड्यूटी कर रहे थे.
इन्हीं चेहरों में एक नाम था रांची सदर अस्पताल के लेजर और लैप्रोस्कोपिक सर्जन डॉ. अजीत कुमार का. पीपीई किट पहनकर घंटों कोविड वार्ड में ड्यूटी निभाने वाले डॉ. अजीत कुमार ने न सिर्फ संक्रमित मरीजों का इलाज किया, बल्कि कई ऐसे मानवीय कार्य भी किए, जो उन्हें एक डॉक्टर से बढ़कर इंसान के रूप में पहचान दिलाते हैं.
कोविड के दौरान सदर अस्पताल में भर्ती एक 90 वर्षीय बुजुर्ग महिला इलाज के बाद पूरी तरह स्वस्थ हो गई थीं, लेकिन उन्हें लेने कोई नहीं आया. भाषा की समस्या के कारण उनकी पहचान भी नहीं हो पा रही थी. ऐसे में डॉ. अजीत कुमार ने हार नहीं मानी. उन्होंने महिला की तस्वीर सोशल मीडिया पर साझा की, प्रशासन और रेलवे अधिकारियों की मदद ली और आखिरकार उनके परिवार का पता लगाया. इसके बाद वह खुद महिला को उनके घर तक छोड़ने गए. महामारी के डर और अनिश्चितता के बीच यह सिर्फ इलाज नहीं, बल्कि इंसानियत की मिसाल थी.

कोविड काल में इलाज तक ही उनका योगदान सीमित नहीं रहा. सदर अस्पताल में कई जरूरतमंद मरीजों को मुफ्त स्पायरोमीटर उपलब्ध कराए गए, ताकि वे फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने वाले व्यायाम कर सकें और संक्रमण के बाद तेजी से स्वस्थ हो सकें. इसके अलावा कोविड की पहली लहर के दौरान डॉ. अजीत कुमार और उनके साथियों ने सरकार को एक लाख रुपये का सहयोग भी दिया.
महामारी के बाद भी डॉ. अजीत कुमार का काम लगातार आगे बढ़ता रहा. उन्होंने रांची सदर अस्पताल में लेजर और लैप्रोस्कोपिक सर्जरी की शुरुआत कराने में अहम भूमिका निभाई. आज जिन ऑपरेशनों के लिए निजी अस्पतालों में लाखों रुपये खर्च होते हैं, वही इलाज सदर अस्पताल में आयुष्मान भारत योजना के तहत गरीब मरीजों को मुफ्त या बेहद कम खर्च में मिल रहा है. अपने संसाधनों से लैप्रोस्कोपिक और लेजर सर्जरी शुरू करने वाला रांची सदर अस्पताल झारखंड का पहला जिला सदर अस्पताल बना.
बीते कुछ वर्षों में डॉ. अजीत कुमार और उनकी टीम ने कई जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक की हैं. बार-बार होने वाले हर्निया का ऑपरेशन, कोलन कैंसर की सर्जरी, आधुनिक लेजर तकनीक से लगभग बिना दर्द वाला पाइल्स का इलाज और कैमरे की मदद से गॉल ब्लैडर की सर्जरी जैसी उपलब्धियों ने सदर अस्पताल को नई पहचान दिलाई है. इन सुविधाओं से आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को निजी अस्पतालों के भारी खर्च से राहत मिली है.
डॉ. अजीत कुमार बताते हैं कि अब सदर अस्पताल में एडवांस लैप्रोस्कोपिक सर्जरी भी की जा रही है. इसमें हर्निया के पांच तरह के आधुनिक ऑपरेशन किए जा रहे हैं. इसके अलावा स्प्लीन (तिल्ली) की सर्जरी और आंत से जुड़ी कई जटिल बीमारियों का भी इलाज आधुनिक तकनीक से किया जा रहा है. उनका कहना है कि कोशिश यही है कि गरीब मरीजों को बड़े निजी अस्पतालों जैसी सुविधाएं सरकारी अस्पताल में ही मिलें.
डॉक्टर्स डे के अवसर पर डॉ. अजीत कुमार की कहानी यह बताती है कि डॉक्टर का काम केवल ऑपरेशन करना या दवा लिखना नहीं होता. कभी वह कोविड वार्ड में मरीज की उम्मीद बनता है, कभी बिछड़े परिवार को मिलाने का जरिया बनता है और कभी आधुनिक चिकित्सा को गरीबों की पहुंच तक ले आता है. सफेद कोट के पीछे सेवा, संवेदना और समर्पण की यही भावना एक डॉक्टर की सबसे बड़ी पहचान होती है.


Leave a Comment