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DSP यू.सी. झा हत्याकांड: सरकार की अपील खारिज, सभी आरोपियों को बरी किए जाने का आदेश बरकरार

झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 2000 के चर्चित डीएसपी यू.सी. झा हत्याकांड में राज्य सरकार की ओर से दायर आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ अपील को खारिज कर दिया. हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा है.
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कोर्ट-कचहरी की खबरें
  • ट्रायल कोर्ट द्वारा 19 जून 2013 को आरोपियों को बरी करने का फैसला सही ठहराया 
  • वर्ष 2000 में डोरंडा स्थित राजेंद्र चौक में एक बच्ची की सड़क दुर्घटना में मौत के बाद हुआ था हिंसक प्रदर्शन 

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 2000 के चर्चित डीएसपी यू.सी. झा हत्याकांड में राज्य सरकार की ओर से दायर आरोपियों को बरी किए जाने के खिलाफ अपील को खारिज कर दिया. हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा है. इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा 19 जून 2013 को दिया गया बरी करने का फैसला सही है और उसमें हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता. कोर्ट ने सरकार की एक्विट्टल अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट द्वारा सभी आरोपियों को दी गई बरी की राहत को बरकरार रखा.


दरअसल  यह मामला 28 दिसंबर 2000 को रांची के डोरंडा स्थित राजेंद्र चौक में हुई हिंसा से जुड़ा है. एक बच्ची की सड़क दुर्घटना में मौत के बाद स्थानीय लोगों ने शव रखकर सड़क जाम कर दिया था. प्रदर्शन के दौरान स्थिति हिंसक हो गई, पथराव और आगजनी हुई तथा पुलिस और सीआरपीएफ की कार्रवाई के बीच तत्कालीन डीएसपी यू.सी. झा गंभीर रूप से घायल हो गए. इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई थी.


राज्य सरकार ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को चुनौती देते हुए कहा था कि गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्यों को सही ढंग से नहीं परखा गया और डीएसपी की मृत्यु उनकी चोटों के कारण हुई थी. साथ ही यह भी दलील दी गई कि जांच अधिकारी द्वारा दर्ज बयान को मृत्यु पूर्व कथन (डाइंग डिक्लेरेशन) माना जाना चाहिए था.


हालांकि कोर्ट ने पाया कि मामले के प्रमुख गवाह अदालत में आरोपियों की पहचान नहीं कर सके. स्वयं सूचक (एफआईआर दर्ज कराने वाले) और डीएसपी के बॉडीगार्ड सहित महत्वपूर्ण गवाहों ने अदालत में आरोपियों की नाम से पहचान नहीं की. जांच अधिकारी ने भी स्वीकार किया कि किसी भी आरोपी की टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) नहीं कराई गई थी.


कोर्ट ने कहा कि जब प्रत्यक्षदर्शी ही आरोपियों की पहचान नहीं कर सके, तब अभियोजन का पूरा मामला कमजोर हो जाता है. केवल एफआईआर में नाम दर्ज होना दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकता.

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