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पर्यावरण एक्टिविस्ट ने सीजेआई को पत्र लिखा,अरावली पर्वतमाला पर दिये फैसले पर पुनर्विचार करने की गुहार

खबर है कि Central Empowered Committee ने खनन पर रोक लगाने की सिफारिश सुप्रीम कोर्ट से की. इस मामले में जवाब देते हुए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल कर राजस्थान में लागू रिचर्ड बर्फी का लैंडफॉर्म सिद्धांत देशभर में लागू करने की बात कही.
 

New Delhi :   राजस्थान में अरावली पर्वतमाला विवाद बढ़ता ही जा रहा है. राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गयी है, साथ ही अरावली पर्वतमाला बचाने के लिए राजस्थान में आंदोलन शुरू हो गये हैं.

 

 

दरअसल  100 मीटर  ऊंचाई का फॉर्मूला पर्वतमाला  के विनाश का सबब बनता जा रहा है. Forest Survey of India(एफएसआई) की रिपोर्ट के अनुसार अरावली की लगभग 10 हजार पहाड़ियों में खनन कार्य होने से यह पर्वतमाला खत्म होने के कगार पर है, यहां खनन रोका जाना चाहिए.  

 

खबर है कि इस रिपोर्ट के बाद Central Empowered Committee ने खनन पर रोक लगाने की सिफारिश सुप्रीम कोर्ट से की. इस मामले में जवाब देते हुए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट दाखिल कर राजस्थान में लागू रिचर्ड बर्फी का लैंडफॉर्म सिद्धांत देशभर में लागू करने की बात कही.

 

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर मुहर लगा दी. जान लें कि इस सिद्धांत के तहत केवल 100 मीटर या उससे ऊंची पहाड़ी को ही पहाड़ और अरावली माना गया. 

 

अब इस फॉर्मूले का देशभर में विरोध हो रहा है. कहा जा रहा है कि इस फॉर्मूले की दिल्ली से 80 किलोमीटर दूर   भिवाड़ी के कैरानी इलाके में हालात बेहद गंभीर हैं. यहां अरावली की पहाड़ियां लगभग गायब हो चुकी हैं. 

 

जानकारी के अनुसार 200-300 फीट ऊंचे पहाड़ों को खनन माफियाओं ने पूरी तरह रौंद डाला है. पहाड़ियों के पास ही बड़े-बड़े क्रेशर प्लांट लगे हैं. सभी वन विभाग की जमीन से सटे हुए हैं.  

 

अरावली पर्वतमाला को लेकर वकील और पर्यावरण एक्टिविस्ट हितेंद्र गांधी ने सीजेआई को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की गुहार लगाई है. यह पत्र राष्ट्रपति को भी भेजा गया है.  

 

दरअसल पिछले माह सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वही भूमि अरावली मानी जाएगी, जो अपने आसपास की स्थानीय जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची हो.  इस फैसले को लेकर विशेषज्ञों ने कहा कि इस परिभाषा से अरावली रेंज के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से को कानूनी संरक्षण नहीं मिल पायेगा.


 
अपने पत्र में हितेंद्र गांधी ने 20 नवंबर के सुप्रीम कोर्ट की ऑपरेशनल परिभाषा पर गहरी चिंता जताई. कहा कि केवल 100 मीटर या उससे अधिक की स्थानीय ऊंचाई को मानदंड बनाना वैज्ञानिक और पर्यावरणीय दृष्टि से अपर्याप्त है. 

 

अरावली पर्वत विवाद पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेन्द्र यादव का कहना है, प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हरित अरावली आंदोलन और हरित अरावली से जुड़े मुद्दे हाल के वर्षों में आगे बढ़े हैं.

 

यही कारण है कि 2014 में इस देश में केवल 24 रामसर साइटें थीं, जिनकी संख्या अब बढ़कर 96 हो गयी है और इनमें सुल्तानपुर, भिंडावास, असोला, सिलीसेढ़ और सांभर की रामसर साइटें शामिल हैं.

 

भूपेन्द्र यादव ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट फैसले में यह भी कहा गया है कि अरावली रेंज के संरक्षण के लिए कदम उठाये जाने चाहिए. कहा कि एनसीआर क्षेत्र में खनन की बिल्कुल अनुमति नहीं है. लोगों का दावा गलत है. 

 

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