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ग्राम प्रधान की हत्या के 19 साल बाद भी लातेहार के कुरूमखेता में डर का माहौल, नहीं पहुंच रही सरकारी योजनाएं

Latehar News : कल्लू उरांव की हत्या के बाद परिवार के बीच डर का माहौल बन गया था. गांव के आसपास कटिया जंगल और नक्सलियों के प्रभाव के कारण परिजन लंबे समय तक खुलकर अपनी बात नहीं रख सके. साल गुजरते गए, लेकिन परिवार की न्याय की उम्मीद अब भी बनी हुई है.
 
सीएम को सौंपा मांग पत्र
  • सीएम हेमंत सोरेन से मिले ग्रामीण, सौंपा मांग पत्र

Latehar News : लातेहार जिले के मनिका प्रखंड स्थित कुरूमखेता गांव आज भी दोहरी पीड़ा झेल रहा है. वर्ष 2007 में पुलिस मुखबिरी के आरोप में नक्सलियों ने तत्कालीन ग्राम प्रधान कल्लू उरांव की गोली मारकर हत्या कर दी थी. 

 

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उस समय उनकी उम्र करीब 45 वर्ष थी. घटना के करीब 19 साल बाद भी उनके परिवार को न्याय का इंतजार है. वहीं दूसरी ओर, गांव के लोग जमीन के अधिकार, सरकारी दस्तावेज और बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

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सीएम से मिले ग्रामीण

 

कल्लू उरांव की हत्या के बाद परिवार के बीच डर का माहौल बन गया था. गांव के आसपास कटिया जंगल और नक्सलियों के प्रभाव के कारण परिजन लंबे समय तक खुलकर अपनी बात नहीं रख सके. साल गुजरते गए, लेकिन परिवार की न्याय की उम्मीद अब भी बनी हुई है.

 

गांव की समस्याओं को लेकर ग्रामीणों का कहना है कि वे प्रखंड कार्यालय से लेकर लातेहार के उपायुक्त तक कई बार आवेदन दे चुके हैं, लेकिन उनकी मांगों पर अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई. मृतक के आश्रित परिवार को न्याय दिलाने, कुरूमखेता को राजस्व ग्राम का दर्जा देने और नौ परिवारों को व्यक्तिगत वन पट्टा उपलब्ध कराने की मांग लंबे समय से लंबित है.

 

इसी सिलसिले में मृतक के परिजन और ग्रामीण मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के पैतृक आवास नेमरा पहुंचे. उन्होंने अपनी समस्याओं से मुख्यमंत्री को अवगत कराया और मांगों से संबंधित आवेदन सौंपा. अब ग्रामीणों को उम्मीद है कि उनकी गुहार पर ध्यान दिया जाएगा.

 

आजादी से पहले बसाए गए नौ परिवार, अब तक नहीं मिला वन पट्टा

ग्रामीणों की ओर से दिए गए आवेदन के अनुसार, आजादी से पहले वन विभाग ने जंगल और वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए कुरूमखेता में नौ परिवारों को बसाया था. इन परिवारों को जंगल में आग बुझाने और वन एवं वन्यजीवों की रक्षा करने की जिम्मेदारी दी गई थी. इसके बदले प्रत्येक परिवार को जीवनयापन के लिए पांच-पांच एकड़ जमीन दी गई थी.

 

ग्रामीणों का कहना है कि वर्ष 2013-14 तक जमीन की रसीद कटती थी, लेकिन अब तक व्यक्तिगत वन पट्टा नहीं मिला है. ग्रामीणों ने पुराने रिकॉर्ड और दस्तावेजों की जांच कर नियमानुसार वन पट्टा देने की मांग की है.

 

करीब 200 की आबादी, राजस्व ग्राम का दर्जा नहीं

कुरूमखेता की आबादी करीब 200 है. ग्रामीणों के आवेदन के मुताबिक, गांव को राजस्व ग्राम की सूची से हटा दिया गया है. इसके कारण जाति प्रमाण पत्र, स्थानीय निवासी प्रमाण पत्र और अन्य जरूरी दस्तावेज बनवाने में परेशानी होती है. इसका असर युवाओं की पढ़ाई, रोजगार और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने पर भी पड़ रहा है. ग्रामीणों ने कुरूमखेता को राजस्व ग्राम की सूची में शामिल करने की मांग की है, ताकि लोगों को जरूरी दस्तावेज बनवाने में परेशानी न हो.

 


सड़क, बिजली, पानी और शिक्षा की सुविधाओं की मांग

ग्रामीणों ने गांव में सड़क, बिजली, पेयजल, आवास, विद्यालय और आंगनबाड़ी जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग भी की है. उनका कहना है कि सुविधाओं की कमी से रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होती है और बच्चों की पढ़ाई पर भी असर पड़ता है. ग्रामीण चाहते हैं कि गांव को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाए.

 

 मुख्यमंत्री को सौंपा आवेदन, तीन प्रमुख मांगें

ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री को दिए आवेदन में तीन प्रमुख मांगें रखी हैं. पहली, वर्ष 2007 में मारे गए ग्राम प्रधान कल्लू उरांव के आश्रित परिवार को न्याय दिलाने के लिए आवश्यक कार्रवाई की जाए. दूसरी, कुरूमखेता को राजस्व ग्राम का दर्जा दिया जाए. तीसरी, गांव में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ नौ परिवारों को नियमानुसार व्यक्तिगत वन पट्टा देने की दिशा में पहल की जाए.

 

आवेदन के साथ ग्राम प्रधान के चयन से संबंधित ग्रामसभा के अनुमोदन की छायाप्रति और व्यक्तिगत वन पट्टा के लाभुकों की सूची भी संलग्न की गई है.

 

19 साल बाद भी परिवार को न्याय का इंतजार है और गांव के लोग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. प्रखंड से जिला प्रशासन तक गुहार लगाने के बाद अब ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री से उम्मीद लगाई है. देखना होगा कि उनकी मांगों पर कब कार्रवाई होती है और कुरूमखेता के लोगों को न्याय, जमीन का अधिकार और बुनियादी सुविधाएं कब मिल पाती हैं.

 

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