Patna News: तलाक से जुड़े मामले में पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पत्नी के किसी अन्य पुरुष के साथ केवल आपत्तिजनक स्थिति में देखने मात्र से व्यभिचार सिद्ध नहीं होता.
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जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस विक्रम सिंह की खंडपीठ ने मधुबनी के फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली पति की अपील को खारिज कर दिया. कोर्ट ने कहा कि आपत्तिजनक स्थिति में होना और वास्तव में संबंध बनाना दो अलग-अलग बाते हैं.
संभावना मात्र से या पति के एकतरफा बयान के आधार पर पत्नी के खिलाफ व्यभिचार (Adultery) की पुष्टि नहीं की जा सकती. ठोस सबूतों और शिकायतों के अभाव में केवल आरोपों के आधार पर शादी को खत्म नहीं किया जा सकता.
जोड़े की शादी 2 जुलाई 2006 को हुई थी और साल 2010 में उनको एक बेटा हुआ था. पति ने पत्नी पर आरोप लगाया कि बच्चे के जन्म के बाद पत्नी ने अपनी बहन के पति के साथ संबंध बनाए. पति ने दावा किया कि उसने दोनों को एक बार आपत्तिजनक स्थिति में देखा था. इसके बाद 30 मार्च 2013 को पत्नी के पिता कुछ लोगों के साथ उसे उसके ससुराल से ले गए और तब से वह अलग रह रही है.
इसी को आधार बनाते हुए पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(i), 13(1)(ia) के तहत कोर्ट में तलाक की अर्जी लगा दी.
पत्नी ने कोर्ट में पति के दावों को खारिज करते हुए कहा कि उस पर लगाए सभी आरोप पूरी तरह मनगढ़ंत और बनावटी हैं. उसने तर्क दिया कि इस तरह के बेबुनियाद आरोप लगाना स्वयं में मानसिक क्रूरता है. उसने भी आरोप लगाया कि पति ने उसे जहर देकर मारने का प्रयास किया था.
जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस विक्रम सिंह की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि कोर्ट में केवल आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उन्हें साबित करने के लिए ठोस सबूत पेश करने पड़ते हैं. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि आपत्तजनक स्थिति में पाए जाने और यौन संबंध स्थापित होने के बीच स्पष्ट अंतर होता है, जिसे बिना साक्ष्य स्वीकार नहीं किया जा सकता है.
कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि घटना के बाद पति ने ना तो पुलिस कंप्लेन की, ना ही सनहा दर्ज कराया और ना ही अपने ससुराल पक्ष या किसी अन्य रिश्तेदारों को इस संबंध में सामने लाया.
हाईकोर्ट ने मधुबनी फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज के फैसले को पूरी तरह सही ठहराया. हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि पति और पत्नी के खिलाफ व्यभिचार और क्रूरता को आरोपों को साबित करने के लिए कोई वैधानिक या ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा है, इसलिए याचिक पोषणीय नहीं है.
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