Ranchi : सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) की हजारीबाग जिले के केरेडारी स्थित चंद्रगुप्त ओपन कास्ट कोल परियोजना में अधिग्रहित की जा रही 417 एकड़ जमीन के रिकॉर्ड गायब होने के गंभीर मामले में अब केंद्र सरकार ने हस्तक्षेप किया है.
आरोपियों को बचाने के प्रयास से जुड़ी शिकायत पर भारत सरकार ने झारखंड सरकार को पत्र लिखते हुए मामले में कार्रवाई करने और मंत्रालय व शिकायतकर्ता को सूचित करने का निर्देश दिया है.
यह मामला तब और गंभीर हो गया, जब अपराध अनुसंधान विभाग (CID), झारखंड ने जमीन के रिकॉर्ड में बड़े पैमाने पर अनियमितता और धोखाधड़ी की पुष्टि कर दी. जांच में सामने आया कि जमीन के मूल दस्तावेजों को गायब कर या अपठनीय और जीर्ण-शीर्ण बताकर जानबूझकर वन संरक्षण अधिनियम, 1980 के FORM ‘A’ (प्रपत्र-1) का गठन किया गया.
सीआईडी ने अपनी जांच पूरी कर पिछले वर्ष जुलाई में कार्रवाई की अनुशंसा के साथ रिपोर्ट गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग को सौंप दी थी. इसके बाद गृह विभाग ने 25 नवंबर को वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग से इस संबंध में वस्तुस्थिति और मंतव्य मांगा था.
राजस्व विभाग से मंतव्य मिलने के बाद दिसंबर माह में वन विभाग के उपसचिव चंद्रशेखर प्रसाद ने आगे की कार्रवाई करते हुए उपायुक्त हजारीबाग और डीएफओ, हजारीबाग पश्चिमी वन प्रमंडल से ही मामले की वस्तुस्थिति और मंतव्य मांगा.
उपसचिव द्वारा उसी स्तर के अधिकारियों से मंतव्य मांगे जाने को लेकर भारत सरकार से शिकायत की गई थी. शिकायत में कहा गया कि जिस स्तर पर गड़बड़ी हुई, उसी स्तर से मंतव्य मांगना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है और यह आरोपियों को बचाने की साजिश को दर्शाता है.
साथ ही यह भी आरोप लगाया गया कि यह प्रक्रिया T.N. Godavarman Thirumulpad बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए निर्देशों के विपरीत है.
शिकायत पर संज्ञान लेते हुए भारत सरकार के अवर वन निरीक्षक प्रशांत राजगोपाल ने झारखंड सरकार के विशेष सचिव को पत्र लिखकर निर्देश दिया है कि मामले में आवश्यक कार्रवाई करते हुए मंत्रालय और शिकायतकर्ता दोनों को इसकी जानकारी दी जाए.
इसी बीच हजारीबाग की एक अन्य कोल परियोजना से जुड़ा 832 एकड़ भूमि जिसमें नदी, नाला और तालाब शामिल हैं के रिकॉर्ड गायब होने का मामला भी सामने आया है, जो अब शीर्ष स्तर तक पहुंच चुका है. इन मामलों ने झारखंड में कोल परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण और वन कानूनों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
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