Ranchi : झारखंड हाई कोर्ट ने एक मामले में कहा है कि नियमित जमानत के लिए आरोपी का न्यायिक हिरासत में होना अनिवार्य है. यह भी कहा कि अंतरिम जमानत पर रहते हुए भी यदि आरोपी अदालत या जांच एजेंसी के निर्देशों का पालन नहीं करता, तो उसे न्यायिक हिरासत में माना नहीं जा सकता. इसे कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा.
हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की कोर्ट ने यह बातें छत्तीसगढ़ के शराब कारोबारी नवीन केडिया की नियमित जमानत याचिका पर अपने आदेश में कही है. हाई कोर्ट ने नवीन केडिया की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है.
हाई कोर्ट के अनुसार, नवीन केडिया को 7 जनवरी 2026 को गोवा से गिरफ्तार किया गया था और 9 जनवरी 2026 को गोवा की अदालत ने उन्हें चार दिन की अंतरिम जमानत दी थी.
अंतरिम जमानत की शर्तों में यह स्पष्ट था कि नवीन केडिया को 12 जनवरी 2026 तक ACB, रांची के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा, जिसके बाद उसे पुलिस हिरासत में लिया जाना था.
आरोपी ने न तो ACB के समक्ष आत्मसमर्पण किया और न ही झारखंड की अदालत में शारीरिक रूप से उपस्थित होकर जमानत याचिका दायर की. इसके बजाय, उन्होंने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश होने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने झारखंड हाईकोर्ट वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम, 2025 के तहत अस्वीकार कर दिया, क्योंकि पहली पेशी के लिए भौतिक उपस्थिति अनिवार्य है.
हाई कोर्ट ने मामले में सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि धारा 439 सीआरपीसी (अब धारा 483 BNSS) के तहत जमानत तभी दी जा सकती है, जब आरोपी हिरासत में हो या उसने अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण किया हो.



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