Ranchi News : झारखंड में बंद होने वाली कोयला खदानों के पुनर्वास और पुनर्पयोग की दिशा में सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. इसके तहत झारखंड के दो बंद पड़ी परियोजना की सूरत बदलेगी. भारत सरकार के कोयला मंत्रालय और जर्मनी की संस्था GIZ के सहयोग से संचालित TCCM परियोजना के तहत गिरिडीह OCP और रामगढ़ जिले की करमा OCP को पायलट परियोजना के लिए चिह्नित किया गया है.
इस संबंध में बुधवार को रांची में अधिकारियों और GIZ के प्रतिनिधियों की बैठक हुई. बैठक में खान एवं भूतत्व विभाग के सचिव अरवा राजकमल समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे. GIZ की ओर से प्रिसिंपल एडवाइजर अभिनव जैन और क्लस्टर कॉर्डिनेटर फिलिप जॉनसन शामिल हुए. बैठक में कोयला मंत्रालय, कोल कंट्रोलर ऑर्गेनाइजेशन, सीसीएव और सीएमपीडीआई के प्रतिनिधियों ने भी भाग लिया.

कोयला मंत्रालय के अधिकारियों और जर्मनी की संस्था GIZ के प्रतिनिधियों की बैठक
खदानों के भविष्य के उपयोग की बनेगी योजना
बैठक में दोनों खदानों के लिए भारत सरकार को अनुशंसा भेजने पर सहमति बनी. इसके बाद खदानों के लिए Final Mine Closure and Repurposing Plan तैयार किया जाएगा. योजना के तहत भूमि, जल, पर्यावरण और आधारभूत संरचना के भविष्य में उपयोग की संभावनाओं का अध्ययन किया जाएगा. बंद खदानों को आर्थिक रूप से उत्पादक परिसंपत्तियों में बदलने पर विशेष जोर रहेगा.
क्षेत्र में नवीकरणीय ऊर्जा, पर्यटन, कृषि और बागवानी की संभावनाएं तलाशने की योजना है. इसके अलावा मत्स्य पालन और सामुदायिक सुविधाओं के विकास पर भी विचार किया जाएगा. कौशल विकास केंद्र स्थापित करने के साथ वैकल्पिक रोजगार के अवसर भी विकसित किए जाएंगे.
स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर
परियोजना के तहत प्रभावित समुदायों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का आकलन किया जाएगा. स्थानीय लोगों के लिए आजीविका और रोजगार के नए विकल्प तलाशे जाएंगे. कौशल विकास और पुनःप्रशिक्षण कार्यक्रमों को भी योजना में शामिल किया जाएगा. बैठक में स्थानीय समुदायों और जिला प्रशासन की भागीदारी सुनिश्चित करने पर विशेष जोर दिया गया.
करमा OCP के आठ गांव प्रभाव क्षेत्र में
करमा OCP के पांच किलोमीटर के प्रभाव क्षेत्र में आठ गांवों को चिह्नित किया गया है. इनमें सुगिया, मरार, बोंगाबार, करमा, कैथा, कंडेर, लोढ़मा और पैंकी शामिल हैं. इन गांवों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है. खदान बंदी से जुड़े स्थानीय समन्वय के लिए एक समिति का गठन भी किया गया है.
पर्यावरणीय पुनर्स्थापन पर रहेगा जोर
परियोजना के तहत विस्तृत DPR (Detailed Project Report) भी तैयार की जाएगी. इसमें पर्यावरणीय पुनर्स्थापन और भूमि उपयोग की विस्तृत योजना शामिल होगी. जल प्रबंधन और Mine Void Management पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा. मौजूदा आधारभूत संरचनाओं के पुनर्पयोग की संभावनाएं भी तलाश की जाएंगी.
इस पहल का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि खनन गतिविधियां बंद होने के बाद क्षेत्र को बेकार न छोड़ा जाए. वैज्ञानिक पुनर्वास के माध्यम से प्रभावित क्षेत्रों में नई आर्थिक गतिविधियां विकसित की जाएंगी. इससे खनन के बाद भी स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिल सकेगी. इस मॉडल को भविष्य में देश की अन्य बंद कोयला खदानों में भी अपनाया जा सकता है.
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