Gumla News: भाद्रपद पूर्णिमा के साथ ही पितृपक्ष की शुरुआत हो चुकी है. पितृपक्ष के दौरान लोग अपने दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए नदी, तालाब एवं अन्य जलाशयों में तर्पण कर रहे हैं. झारखंड-छत्तीसगढ़ सीमा पर स्थित बाला नदी में भी प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर विधि-विधान से अपने पितरों को जल अर्पित कर रहे हैं.
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रविवार को जनकपुर धाम (नेपाल) से आए महंत एवं मामा जी बैजू झा, शंख मोड़ मांझाटोली निवासी अमरेश कुमार झा, कमलेश कुमार झा एवं राकेश कुमार झा ने आचार्य सुनील कुमार पाठक के मंत्रोच्चारण के बीच बाला नदी में पितरों का तर्पण किया. इस दौरान श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से जल, तिल एवं पुष्प अर्पित कर अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि दी.
आचार्य सुनील कुमार पाठक ने बताया कि भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक पितृपक्ष की अवधि मानी जाती है. इस दौरान पितरों के निमित्त तर्पण एवं श्राद्ध कर्म किया जाता है. पितरों की मृत्यु तिथि पर विशेष अनुष्ठान करने की परंपरा है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम ने भी पुष्कर में अपने पितरों का तर्पण किया था. पितृपक्ष में श्राद्ध एवं तर्पण के माध्यम से लोग अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं.
वहीं, लोदाम क्षेत्र से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाला नदी पहुंचे और पितरों को तर्पण किया. आचार्य दिनेश पांडेय ने कहा कि मनुष्य का अस्तित्व अपने पूर्वजों के कारण है. इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक अपने पितरों को जलांजलि, तिलांजलि एवं पुष्पांजलि अर्पित करनी चाहिए. साथ ही ब्राह्मणों एवं जरूरतमंदों को सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र एवं द्रव्य का दान करना चाहिए.
उन्होंने कहा कि पितृपक्ष के दौरान कुत्ते, कौए और गाय को भोजन कराने की भी धार्मिक परंपरा है. मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए इन कर्मों से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है.
तर्पण के बाद श्रद्धालुओं ने बाला नदी के तट पर स्थित भोले बाबा को जल अर्पित कर पूजा-अर्चना की. इसके बाद प्रसाद का वितरण किया गया. पितृपक्ष को लेकर बाला नदी के तट पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही.
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