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5 करोड़ की गाड़ी से थोड़ा उतर जाते, तेजस्वी यादव तो शायद झारखंड की धूप लग जाती...

लालू यादव एक जमीनी नेता हैं, लेकिन उनके बेटे में नजर नहीं आती है. तेजस्वी यादव को राजनीति विरासत में जरूर मिली है, पर जमीनी जुड़ाव अभी उतना मजबूत नहीं दिखता. अगर वे सच में जमीनी नेता होते, तो रांची में आयोजित कार्यक्रम के दौरान अपनी गाड़ी दूर खड़ी कर पैदल कार्यकर्ताओं के बीच आते, उनसे मिलते-जुलते.
 

Ranchi: लालू यादव एक जमीनी नेता हैं, लेकिन उनके बेटे में नजर नहीं आती है. तेजस्वी यादव को राजनीति विरासत में जरूर मिली है, पर जमीनी जुड़ाव अभी उतना मजबूत नहीं दिखता. अगर वे सच में जमीनी नेता होते, तो रांची में आयोजित कार्यक्रम के दौरान अपनी गाड़ी दूर खड़ी कर पैदल कार्यकर्ताओं के बीच आते, उनसे मिलते-जुलते.

 

लेकिन ऐसा देखने को नहीं मिला. सम्मान समारोह में बड़ी संख्या में लोग उनके स्वागत के लिए तैयार थे, बावजूद इसके वे सीधे रेडिएशन ब्लू होटल से गाड़ी में बैठकर कार्यक्रम स्थल पहुंचे और वहीं तक सीमित रहे.

 

वहीं, उनके पिता लालू यादव का दौर अलग था—जहां भी भीड़ होती, वे खुद वहां पहुंच जाते थे, लोगों से खुलकर मिलते थे, बातचीत करते थे, फोटो खिंचवाते थे. यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी.

 

तेजस्वी यादव की राजनीति फिलहाल कुछ हद तक कॉर्पोरेट स्टाइल की नजर आती है. अगर उन्हें लंबे समय तक राजनीति में टिकना है और मुख्यमंत्री बनना है, तो उन्हें जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओं को समझना होगा. जब तक वे जमीन से जुड़कर राजनीति नहीं करेंगे, तब तक उनकी राह आसान नहीं होगी.

 

रांची में कार्यक्रम के दौरान कई नेता उनके स्वागत के लिए खड़े थे, लेकिन तेजस्वी यादव किसी से मिले बिना सिर्फ प्रोटोकॉल के तहत आए, भाषण दिया और वापस चले गए. ऐसा नहीं है—जनता सब समझती है, कोई भी इतना भोला नहीं है.

 

वे लालू प्रसाद यादव के बेटे जरूर हैं, लेकिन उनके जैसा जमीनी जुड़ाव तेजस्वी में अभी नजर नहीं आता. लालू यादव जहां भी जाते थे, लोगों के बीच घुल-मिल जाते थे, हर किसी से मिलते थे—यही उनकी असली ताकत थी.

 

लेकिन तेजस्वी की राजनीति अभी कॉर्पोरेट स्टाइल की ज्यादा लगती है. जमीन से जुड़े बिना, आम लोगों के बीच गए बिना, उनकी समस्याएं समझे बिना असली नेतृत्व नहीं बनता.

 

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